आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट
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नेत्र रंजकपित्तः—यह लोहयुक्त है और नेत्र के 'कालक' में रहता है। इस जाति का रंजक नीग्रों जाति की त्वचा में भी रहता है। शरीर के किसी २ ( संधानक ) घातु में, अपरा में और नाडियों में भी पाया जाता है।
केशरंजक पित्तः—बालों में अनेक प्रकार के रंग रहते हैं। इन रंगों के कारण किसी के बाल काले तो किसी के भूरे रहते हैं। इसके अभाव में बाल सफेद हो जाते हैं।
साधक पित्तः—इसके विषय में यह कहा गया है कि—
यत् पित्तं हृदयस्थितं तस्मिन् साधकोऽभिरिति संज्ञा; सोऽभिप्राथितमनोरथसाधनकृदुक्तः ॥ (सु. सू. अ. २१)
जो पित्त हृदय में रहता है उसको साधक अग्नि कहते हैं अथवा उसमें स्थित अग्नि को साधक कहते हैं। वह मन के अपेक्षित विषयों का साधक है।
हृदय के विषय में विशेषतः दृढ़त घातुप्रसाद के विषय में दो तरह से विचार किया जाता था; एक करणवृत्तिरूपवायु की दृष्टि से और दूसरा आत्मस्थान की दृष्टि से। जब करणवृत्तिरूपवायु की दृष्टि से विचार किया जाता था तब हृदयस्थित घातुप्रसाद को शीर्षस्थित प्राण का संचार क्षेत्र कहा जाता अर्थात दृढ़त घातुप्रसाद, एक 'वायवीयद्रव्य' माना जाता। किंतु जब आत्मस्थान की दृष्टि से विचार किया जाता तब इसको 'पित्त' शब्द से संबोधित किया जाता। उक्त विधान इस दृष्टि से ही किया गया है।