भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 235 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221

परिशिष्ट

२०१

नाश से रूप ज्ञान कतई नष्ट हो जाता है। अतः इस पित्त विवेचन में दृष्टि शब्द की व्याप्ति चतुर्थपटलस्थित धातुप्रसाद तक बढ़ाना आवश्यक है।

दृष्टि संज्ञक विवर का और चतुर्थपटल का संबंध इस तरह भी है कि दृष्टिमंडल का जो हिस्सा दृष्टि के भीतर खुला हुआ है उसके पिछले भाग में एक रंगीन अणु अवयवों की तह है। यह तह चतुर्थ पटल के रंगीन स्तर का आगे बढ़ा हुआ हिस्सा ही है।

दृष्टिविवर के पीछे ‘तृतीय पटल’ या ‘अशिकाच’ है। यह ‘भेद’ का ( भेदस्तृतीयं पटलम् ) बना हुआ, पारदर्शक व बाह्यगोल है। इसके पीछे अक्षिलेष्म है जो कि पारदर्शिका कला से ढंका हुआ है। इस अक्षिलेष्म के ही पीछे चतुर्थपटल है। इस चतुर्थपटल में ‘लिंग’ नामक एक भाग है। इसका व्यास दूई अंगुल और रंग ईश्वरीय है। इसके मध्य में एक दबा हुआ अंग है; उसको ‘लिंग नाभि’ कहते हैं। लिंग भाग के और उसके आसपास के नाडीजाल को देखते हुए यह कहना पड़ता है कि यह मस्तिष्क का परिवर्धित रूप है। लिंग भाग में शंक्वाकृति अणुअवयव हैं। प्रकाश से इनमें हलचल पैदा होती है। इसके पास रंगीन अणुअवयवों की तह है।

किसी भी ‘लक्ष्य’ से परावर्तित होने वाले प्रकाशकिरणों को क्रमशः कृष्ण मंडल, दृष्टि, तेजोजल, अशिकाच और अक्षिलेष्म इनमें से पार होकर लिंग भाग पर पड़ना जरूरी है तब कहीं रूप ग्रहण होता है। प्रकाश किरण, जब नेत्र में प्रविष्ट होते हैं तब उनका कृष्ण मंडल, तेजोजल, अशिकाच और अक्षिलेष्म, इनकी बाह्य गोलता व सपेक्ष