आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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आयुर्वेद-दर्शन
प्रभा ' तैजसी ' होकर सात प्रकार की है; रक्ता, पीता, श्यामा हरिता, पांडुरा और कृष्णा ।
छाया में दो प्रकार हैं; छाया और प्रतिच्छाया ( पडछाह ) तहां छाया, वर्ण प्रभाश्रिता रहती है और इसके ' सुषमा ' व ' विषमा ' दो प्रकार हैं । चूंकि जब कि शरीर पंच महाभूतों का बना है तब छाया भी विविध होती है । जैसा कि:— नाभसी छाया निर्मला, सस्नेहा, व सप्रभा रहती हैं; वायवी रूक्षा, श्यावारुणा व हतप्रभा रहती है; आग्नेयी रक्ता, दीप्तामा व दर्शनप्रिया रहती है; जलीया, स्फटिक विमला व सुस्निग्धा रहती है और पार्थिवी स्थिरा, स्निग्धा, घना, श्लक्ष्णा, श्यामा व श्वेता रहती है । प्रतिच्छाया ' संस्थानाकृतिलक्षिता ' होती है । इसके संस्थान जल, ऐना, आतप आदि होते हैं और आकृति अल्प, मध्य, महान् इ. होती है ।
ब्राजक पित्त व प्रभा दोनों तेजस् होने के कारण ब्राजक, प्रभा की वृद्धि करता है और प्रभा, छाया को प्रकाशित करती है ।
इस ब्राजक पित्त का संबंध हमारी राय में वसाख्य तेज से है । यह तेज ही मांसधरात्वक् में केश ग्रहों के नीचे जो स्निग्धपिंड ' हैं उनमें रहता है और स्वचा को मृदु, चिकनी व कांतियुक्त रखता है । इसमें पक्ति धर्म भी है जैसा कि ' तेन मार्दवंसौकुमार्यमृदुत्प रोमतात्साहृष्टिस्थितिपात्तिकातिदीप्तयो भवंति ' इसमें स्वीकार किया गया है । और यदि यह सत्य हो तो वसाख्य तेज की व्याप्ती के अनुसार ब्राजक पित्त को भी अधिक व्यापक बनाना उचित था ।