भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

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आयुर्वेद-दर्शन

मुखगत क्लेदकः—यह कर्णमूलस्थ पिंडोंसे व घीवक पिंडों से स्तुत होता है और लालारस में 'मुखगतपाचकपित्त' के साथ शामिल रहता है। लालारस में इनके साथ २ बोधक कफ भी रहता है अन्नकर्णों को अलग २ करना जो कि एक रासायनिक कार्य है; सुख्यतः लालासत्य नामक अभिपूर्त्ता का अर्थात् मुखगतपाचकपित्त का है। पर यह कार्य सुखपूर्वक होने के लिये क्लेदन की आवश्यकता रहती है।

आमाशय गत क्लेदकः—आमाशय की उपश्लेष्मी कला में जो श्लेष्मपिंड हैं उनसे यह स्तुत होता है और जाठर रस में अम्लपित्त के साथ शामिल रहता है।

शुद्रांत्रगत क्लेदकः—शुद्रांत्र की उपश्लेष्मी कला में सोममंडलों के गुच्छ के गुच्छ हैं जोकि सूर्यमंडलों को घेरे हुए हैं। इनसे क्लेदक स्तुत होता है।

बृहदत्रगत क्लेदकः—यहां के 'सोममंडल,' शुद्रांत्रस्थ मंडलों की अपेक्षा बड़े हैं। उनसे पैदा होने वाला क्लेदक ही यहां का प्रधान रस है।

चूक जब कि शरीरगत उदक सिद्धांततः श्लेष्मा है और उसकी पूर्ति क्लेदक करता है तब पित्तगत उदक भी इसका ही अंश है। और इस कारणही लालारस में तथा याकृतपित्त में पिच्छिच्छगुण श्लेष्क उपलब्ध होता है।

अवलंबकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

उरःस्थः, त्रिकसंधारणमात्सवीर्येणान्नरस-

सहितेन हृदयावलंबनं करोति । (सु. सू. अ. २१)