भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 235 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 228

२०८

आयुर्वेद-दर्शन

तर्पकः—इसके विषय में यह कहा गया है किः—

शिरःस्थः स्नेहसंतर्पणाधिकृतत्वात्

इंद्रियाणामात्मवैर्येणानुग्रहं करोति । (सु. सू. अ.२१)

अर्थात् तर्पक शिर में रहता है । स्नेहन ( चिकनाहट ) और तर्पण ( तरी ) उसका कार्य है । यह अपनी शक्ति से समस्त इंद्रियों पर अनुग्रह करता है ।

मस्तिष्क और सुषुम्नारज्जु के बीच में ' पश्मापरा ' Ciliated Epithelium की बनी हुई एक थैली है । इस थैली में यह भरा रहता है । यह मस्तिष्क तथा सुषुम्ना को भीतर से तर रखता ही है सिवाय इसके आवरणों के बीच में और उनकी सतह पर फैल कर बाहर से भी तर रखता है ।

काय्य ने संभवतः इसीके उपलक्ष्य में यह कहा है कि ' अकुपित स्नेष्मा, उत्साह शान, बुद्धि, क्षमा, धृति, अलोभ आदि भावोंको पैदा करता है आर कुपित स्नेष्मा आलस्य, अशान, मोह, आदि ताद्विपरीत भावों को ।

इस तर्पक की विकृति से ही ' मोहज्वर ' ( Meningitis ) होता है ।

इस तर्पक के द्वारा अन्य इंद्रियों का तर्पण होना जिस हेतु से कहा गया है उस पर विचार किया जाय तो यह ज्ञात होगा कि जहां २ पश्मापरा है वहां २ के तरल को ऋषि, तर्पक कहना चाहते हैं । क्योंकि पश्मापरा शरीर में अन्यत्र भी रहती है; उससे