आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 235 में से
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आधुनिक दर्शन
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसोगतः । इन्द्रियांतर संचारः प्रेरणधारणं च यत् ॥ देशांतरगतिः स्वप्ने पंचत्व ग्रहणं तथा । दृष्टस्य दक्षिणे नाश्चिन्ना सन्व्येनापगमस्तथा ॥ इच्छाद्वेषः सुखदुःखं प्रयत्नश्रेतनाश्रुतिः । बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिंगानि परमात्मनः ॥ यस्मात्समुपलभ्यते लिंगान्येतानिजीवतः । न मृतस्यात्मलिंगानि तस्माद्गुरुर्महर्षयः ॥ शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् । पंचभूतावशेषत्वात् पंचत्वं गतमुच्यते ॥
आत्मवादी आत्मा को यद्यपि कर्ता और ज्ञाता कहते हैं तथापि उनकी दृष्टि से कर्तृत्व और ज्ञातृत्व भिन्न २ नहीं हैं। वे कर्तृत्व का ज्ञातृत्व में ही समन्वय करते हैं अथवा ज्ञातृत्व के कारण ही कर्तृत्व स्वीकार करते हैं। उनका कथन है कि:—
चेतनावान् यतश्चात्माततः कर्ता निरुच्यते ।
अर्थात् आत्मा चेतनावान् होने के कारण ही कर्ता कहा जाता है। इस पर यदि यह कहा जाय कि ‘जिसमें किया रहती है वह कर्ता है’ तो आत्मवादी इसको स्वीकार नहीं करते। क्योंकि वे स्पष्ट ही कहते हैं कि:—
अचेतनत्वाच्चमनः क्रियावदपि नोच्यते ॥