भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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पारीक्षिमौद्रव्य का आत्मवाद

२३

यह मन, आत्मा के सहस्र महान् अर्थात् सर्व-देह-व्यापक नहीं है, अपितु 'अणु' है। अणु होने के कारण वह एक ही समय में समस्त इन्द्रियों में सञ्चार नहीं कर सकता। जैसा कि उक्त उदाहरणों पर से भी सिद्ध होता है। उसी तरह वह एक है। इस पर यदि यह कहा जाय कि 'किसी फल को खाने के समय उसके स्पर्श, रूप, रस, गंध, कुरमुर शब्द आदि का जो ज्ञान होता है वह उसके महान् अथवा अनेक होने का परिचायक है' तो उसका उत्तर यह है कि मन अणु और एक होते हुए भी बड़ा चंचल है। उसकी चपलता के कारण ही उक्त सब प्रकार का ज्ञान एक ही समय में होने का भास होता है।

मन के कार्यों के विषय में यह कहा गया है कि:—

चिंत्यं विचार्यमूढांच ध्येयं संकल्प्यमेवच ।

यत्किंचिन्मनसांज्ञेयं तत्सर्वं ह्यर्थसंज्ञकम् ॥

इंद्रियाभिग्रहःकर्म मनसः स्वस्थ निग्रहः ।

ऊहोविचारश्रुततः परं बुद्धिःप्रवर्तते ॥

इंद्रियेणेंद्रियाथो हि समनस्केन गृह्यते ।

कल्प्यते मनसाप्यूर्ध्वं गुणतो दोषतो यथा ॥

जायते विषये तत्र या बुद्धिनिश्चयात्मिका ।

व्यवस्यति तथा वक्तुं कर्तुं वा बुद्धिपूर्वकम् ॥