आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
DevanagariHindipublished235 पृष्ठ
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शरलोमा का सत्ववाद
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सत्ववादियों का अथवा प्रकृतिपुरुषवादियों का मुख्य सिद्धांत यह है कि:—
‘ तत्र कारणानुरूपं कार्यमिति कृत्वा सर्वं एवैते विशेषाः सत्त्वरजस्तमोमया भवन्ति, तद्वजन्तत्वात्तन्मयत्वात्तद्गुणा एव पुरुषा भवन्ति ’ ।
‘ कार्य सर्वदा कारण के अनुरूप होता है ’ तदनुसार आकाशादि धातु सत्त्वरजस्तमोमय हैं और कर्म पुरुष भी तद्गुण ही हैं क्योंकि इनकी अभिव्यक्ति इन गुणों से होती है और इनमें गुणों के पसार के अतिरिक्त कुछ नहीं है ।
सुश्रुत संहिता में इस मत को ‘ इति एकं भाष्यते ’ अर्थात् परमत बतलाया है । आयुर्वेद के प्रायोगिक क्षेत्र में आत्मवाद के सद्दश इसका भी अधिक प्रवेश नहीं है ।
शरलोमा, रसपरिषद् में और वातकलाकलीय परिषद् में उपस्थित नहीं थे ।