भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुवद-दर्शन

सचेतन स्मृष्टि पैदा होती है। फिर भी यज्ञः-पुरुषीय-पारिषद् में उन्होंने 'रस' को पुरुषरोगोत्पादक कहा। जैसा कि:—

रसजानितु भूतानि व्याधयश्च प्रुथग्विघ्नाः।

आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्ति हेतवः ॥

अर्थात् समस्त प्राणी और उनकी व्याधियाँ 'रस' से पैदा होती हैं। रस जलो में रहता है अतः जलों को भी सचेतन स्मृष्टि के उत्पत्ति में कारण कहते हैं।

वायोंविद् के इस रस को जानने के पूर्व यह स्वीकार करना होगा कि यह रस उनके त्रिधातु-सिद्धांत की ही कोई वस्तु है। इस दृष्टि से देखा जाय तो आर्तविक जलों में रहनेवाला यह रस वही है जिसको श्रुतियों में 'सोम' शब्द से संबोधित किया है। वैदिक ऋषि, सचेतनस्मृष्टि की उत्पत्ति का संबंध सामान्यतः आर्तविक जलों के साथ प्रस्थापित करते ही थे। क्योंकि जहां आर्तविक जलों की संभावना रहती है वहां सचेतन स्मृष्टि की भी संभावना रहती है फिर भी उनका लक्ष्य जलगत उस 'धर्म' पर था जो कि आर्तविक जलों के घटक में प्रधान घटक है।

इस विषय में “सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो-भिन्नोऽवरुणोऽअग्निः।” (यजु० अ० ७ मं. १४) यह मंत्र मन्त्रीय है। इसमें यह कहा गया है कि सोम की विश्व