भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आधुनिक दर्शन

अ. ३ श्लो. ६४ ) इसको बुद्धि-बल-वर्धक माना जाता है । इसकी रक्षा के लिये त्रव्याचर्य का विधान है । वर्तमान वैज्ञानिक भी इसका शुक्र संबंधी अवयवों से सूत [ अंतः सूत ] होना, इसके द्वारा बुद्धिद्रिय [ Nervous system नाडी संस्था ] का पोषण होना और इससे उपरिहृष लक्षणों [ मूछे, गंभीर स्वर इ० ] का पैदा होना स्वीकार करते हैं ।

२ पर ओजः—इस के विषय में यह कहा गया है किः-

यत् सारमादौ गर्भस्य यत्तद्रभैरसाद्रसः ।

संवर्तमानं हृदयं समाविशति यत्पुराः ॥ (च.सू.अ.३०)

पर ओज, गर्भ का 'आद्य सार' है । (अर्थात् शुक्रार्तव अथवा बीज Spermatozoon फल Ovum संज्ञक अणु अवयवों Cells का और उनके संयोग से बननेवाले 'गर्भांकुर' Fertilized Ovum का मूलघटक है । 'इसको जीवनायतनौजस्' Nucleo protein कहते हैं । यह शरीर गत समस्त 'अणु-अवयवों' में रहता है । ) यह गर्भरस का अर्थात् 'कलल' का भी सारभूत द्रव्य है । यह सर्व प्रथम हृदय में प्रविष्ट होता है और इस कारण ही हृदय, अन्य इंद्रियों के पहिले अपने कार्य में सम्यक् प्रवृत्त होता है ।

यस्यनाशाचतु नाशोस्ति 'धारि' यत् हृदयाश्रितम् ।

( च. सू. अ.३० )