भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

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आयुर्वेद-दर्शन

परओज का जितना महत्त्व है उतना ही फलगत तेज का है । यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि शुक्रमलसंज्ञक ओज, जिस तरह पुरुष के शुक्र संबंधी अवयवों से अंतःस्रुत होता है उसी तरह स्त्रियों के फल संबंधी अवयवों ( अंतःफल Ovary अथवा फलकोष Graafian follicles ) से भी एक प्रकार के स्निग्ध द्रव्य का अंतःस्रुत होना संभवनीय माना जाता है । दृष्टि-स्थिति-विधायक तेज, तेजोजल [ इसका 'तेजोजलाश्रितवाहाम्' सु. अ. उ. १ इस तरह उल्लेख है । इसको पाश्चात्य Aqueous Humours कहते हैं ] में रहता है । दीप्तिकांतिकर तेज, मांसधरात्त्वक के केश-गृहों के नीचे वाले पिंडों में रहता है ।

इस तेज के भी व्यापद् विस्मसन-क्षयसंज्ञक विकारों का अलग विवेचन उपलब्ध होता है ।

धातु-प्रसाद को पहिले वर्गीकरण में पंचेंद्रियों का द्रव्य कहा गया है और उसके अनेक होने का भी स्वीकार किया गया है । वर्तमान समय के वैज्ञानिकों को इसके श्वेत और धूसर दो प्रकार उपलब्ध हुए हैं । इंद्रियव्यापकस्पर्श-नेंद्रिय अथवा नाडीसंस्था Nervous system इन्हीं की बनी हुई है । पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय, अर्तीन्द्रिय, बुद्धीन्द्रिय इनकी रचना इन्हीं द्रव्यों की है । इस तरह यह धातुप्रसाद, ज्ञान