आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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आयुर्वेद-दर्शन
गर्भांकुरगत अथवा गर्भगत वातापितः श्लेष्मा ओं की इन सापेक्ष मात्रा ओं को ही दोषप्रकृति कहते हैं। इन प्रकृतियों के प्रधान लक्षण निम्नलिखित हैं।
श्लेष्माप्रकृतिः—“श्लेष्मा हि स्निग्ध श्लक्ष्ण मृदुमधुरसार सांद्र मंद स्तिमित गुरु शीत पिच्छिच्छाच्छः। तस्य सेहात् श्लेष्मलाः स्निग्धांगाः, श्लक्ष्णत्वात् श्लक्ष्णाः, मृदुत्वात् दृष्टिसुखमुकुमारावदाताः, माधुर्यात् प्रभूत शुक्ल व्यवायापत्याः, सारत्वात् सारसंहतस्थिरशरीराः, सांद्रत्वात् उपचित परिपूर्ण सर्व गात्राः, मंदत्वात् मंदचेष्टाहाराविहाराः, सौम्यत्वात् अशीघ्रांभक्षोभविकाराः, गुरुत्वात् साराधिष्ठितावस्थितगतयः, सैत्यात् अल्पक्षुत्तूष्णासंतापरवेददोषाः, विज्जलत्वात् सुदिलष्ट सारबंध संधानाः तथा अच्छलत्वात् प्रसन्नदर्शनाननाः प्रसन्नवर्णस्वराश्च। त एवं गुणयोगात् श्लेष्मला बलवंतो वसुमंतो विद्यावंत ओजस्विन आयुष्मंतश्च भवति। ( च. वि. अ. ८ )
इसके अतिरिक्त सुश्रुत संहिता में यह भी कहा गया है कि कफप्रकृति पुरुष स्वप्न में कमल, हंस, चक्रवा इनसे युक्त ( अथवा केवल भी ) जलाक्षरों को देखता है।
इसका तापमान प्रायः ९६ से ९७। अंश तक रहता है, नींद में लार टपकती है और सुर्खाटें लेता है। प्रतिप्रयाय, कास, खास, अग्निमांघ इन व्याधियों की प्रवणता रहती है।