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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

प्रेमोपहार

A black and white photograph of a man in traditional Indian attire, standing indoors. He is wearing a light-colored kurta and dhoti, with a decorative shawl draped over his left arm. He wears a tall, ornate turban (pheta) with a tassel. He is standing in front of a paneled wall with a decorative wall hanging to the left.

प्रस्तावना

संसार के समस्त विज्ञान, जिस तरह भाव स्वभावों के विशिष्ट प्रकार के वर्गीकरण पर अथवा अन्वर्थ व्यतिरेक पर अपना पृथक् अस्तित्व रखते हैं उस तरह आयुर्वेद भी अपना पृथक् अस्तित्व रखता है। दूसरी भाषा में आयुर्वेद का तंत्र उसके विशिष्ट प्रकार के दार्शनिक सिद्धांत पर अवलंबित है। इस आयुर्वेद दर्शन में आयुर्वेद के दार्शनिक सिद्धान्त को ही जानने का यथामति यत्न किया गया है। इस प्रवृत्ति का एक कारण यह भी है कि आयुर्वेद के दार्शनिक विधानों का ऐतिहासिक दृष्टि से अभ्यास करते हुए जिन अतीत घटनाओं पर प्रकाश पड़ रहा है और भविष्य में पड़ना संभव है उन पर यदि विचार किया जाय तो केवल आयुर्वेदिक ही नहीं बल्कि समस्त आर्य विज्ञानोंतिहास की कई उलझने सरलता से सुलझ सकती हैं।

प्रत्येक दर्शन के सामान्यतः दो प्रतिपाद्य विषय होते हैं; सृष्टि विज्ञान और अध्यात्म। इन दोनों के विषय में सामान्यतः यह कहा जा सकता है कि सचेतन अचेतन द्रव्यों के उत्पादक विनाशक पदार्थों का अथवा द्रव्यगुण कर्मों का प्रधानतया विचार करना सृष्टिविज्ञान का विषय है और इनकी तह में आत्मा, विराट्पुरुष, या ब्रह्म के अस्तित्व का अनुभव करना अध्यात्म का। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि मानुषी बुद्धि ने प्रथम सृष्टिविज्ञान का अभ्यास किया और इसके बाद अध्यात्म का। आयुर्वेद दर्शन में यद्यपि दोनों विषयों का प्रातिपादन है तथापि उसका प्रधान विषय सृष्टि विज्ञान

है। क्योंकि उसमें मोक्ष की अपेक्षा मात्र स्वभाव, आसु, पुरुष, रोग आदि सृष्टि विज्ञान संबंधी विषयों पर अधिक विचार किया जाता है। और इस पर से यह भी सिद्ध होता है कि अन्य दर्शनों की अपेक्षा आयुर्वेद दर्शन अधिक प्रश्चीन है। अन्य दर्शनों का प्रचार इसके बाद हुआ; वे अध्यात्म प्रधान हैं; उनका एक मात्र साध्य मोक्ष है और सृष्टि विज्ञान पर वे उत्तम ही विचार करते हैं जितना कि उनके बुद्धि-वाद के लिये आवश्यक है। हम तो यह भी कहने के लिये प्रस्तुत हैं कि भारतीय आर्य सृष्टिविज्ञान की दृष्टि से आयुर्वेद सम्मत सृष्टिविज्ञान ही स्वीकार करने योग्य है।

उपनिषदों में भी कुछ अध्यात्म प्रधान हैं तो कुछ सृष्टिविज्ञान प्रधान। सृष्टिविज्ञान प्रधान उपनिषद् अधिक प्राचीन हैं। प्रजापति-वाद और पुरुष सूक्त, सृष्टिविज्ञानप्रधान उपनिषद् ही हैं जिनका कि वेदों में उल्लेख है। इनके अतिरिक्त तीन उपनिषदों का आयुर्वेद में उल्लेख है। इनको वातकलाकलीय, आत्रेयभद्रकाप्यीय और यजुः पुरुषीय कहते हैं। इन परिषदों पर से ही आयुर्वेद दर्शन का समुचित ज्ञान हो सकता है अतः इन पर अधिक विचार करना आवश्यक है।

चरक संहितांतर्गत उक्त परिषदों के काल निर्णय के लिये यह ध्यान में रखना चाहिये कि इनका अयोजन पुनर्वसु आत्रेय के समय में और उनकी अध्यक्षता में हुआ। पुनर्वसु आत्रेय, अग्निवेश के गुरु थे और अग्निवेश के आश्रम में द्रोणाचार्य ने अध्ययन किया। पुनर्वसु, कृष्णार्त्रेय के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। व्यास ने इनको इसी नाम से संबोधित किया है। और इन परिषदों के समय वाल्हीक देश वैदिक संस्कारों से संस्कृत था।

इन परिषद् में जो ऋषि उपस्थित थे वे भिन्न २ सृष्टि विज्ञानों के समर्थक और अधिकांश भिन्न २ आयुर्वेदिक तंत्रों के प्रवर्तक थे। इनका लक्ष्य मुख्यतः भाव स्वभाव, आयु, पुरुष, रोग आदि सृष्टि विज्ञान संबंधी विषयों पर था। मान्य होता है कि सृष्टिविज्ञान प्रधान परिषद् में प्रायः आयुर्वेद तंत्र प्रवर्तक ही उपस्थित हुआ करते थे। किंतु जो शब्दादि तन्मात्राओं को कारण गुण मानते थे वे आयुर्वेद तंत्र प्रवर्तक नहीं थे। इन परिषद् का आयुर्वेद में संग्रह किया जाना स्वाभाविक है। पर आयुर्वेद का अध्ययन कभी सर्व साधारण का विषय नहीं रहा और इस कारण ही सर्व साधारण समाज इनसे अपरिचित रहा।

यज्ञः पुरुषीय परिषद् में जिन भिन्न २ सृष्टिविज्ञानों का उल्लेख है उनके स्वरूप, उत्थान, पौर्यापथ्य, संबंध आदि पर विचार किया जाय तो तर्पूर्वकालीन सहस्रां वर्षों का वह वैज्ञानिक इतिहास उपलब्ध होगा जिसके कि आधार पर समस्त आर्यज्ञान विकास की कड़ियाँ क्रमशः जोड़ी जा सकती हैं। इसमें प्रधान आपत्ति यह है कि इनका विवरण अत्यंत संक्षेप में उपलब्ध होता है। फिर भी पूर्व संस्कारों को छोड़कर सावधानी से अन्वेषण किया जाय तो इसमें भी सफल हो सकते हैं। इसके लिये सर्व प्रथम यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि सृष्टिविज्ञानों का यह नाटक शिष्य मुष्टि वैद्यार्थ्य नहीं है बल्कि किसी समय इनका प्रचार था और इनके आधार पर आयुर्वेदिक तंत्र भी रचे गये थे।

आयुर्वेद के अभ्यासक भलीभांति जानते हैं कि आयुर्वेद के तंत्र ( हेतु लिंगोपथ ) और मंत्र ( दर्शन ) विषयक कई विधानों में परस्पर विरोध और पारिभाषिक शब्दों में विभिन्नता है। हमारे मत

से इनका संबंध भिन्न २ सृष्टिविज्ञानों से है। इनको उन २ सृष्टि विज्ञानों के साथ जोड़ा जाय तो दोनों पर अधिक प्रकाश पड़ता है। यज्ञः पुरुषीय परिपद में जो ऋषि उपस्थित थे वे अन्य परिषदों में भी उपस्थित थे। उन परिषदों में उन्होंने जो वक्तव्य दिया है वह भी उनके सृष्टि विज्ञान पर प्रकाश डालता है। इस तरह अंतर्गत प्रमाणों के द्वारा उनका कुछ स्वरूप व्यक्त हो जाने पर वैदिक, औपनिषदिक, और तदनुकूल प्रमाणों की सहायता से भी इनका अधिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

उक्त पद्धति से जब इन सृष्टिविज्ञानों का अध्ययन किया गया तब यह ज्ञात हुआ कि आर्य ज्ञानेतिहास में इन सृष्टि विज्ञानों का अस्तित्व अध्यात्म प्रधान दर्शनों और उपनिषदों के भी पहिले था। इनके पौराणपर्य पर से यह भी ज्ञात होगा कि सृष्टिविज्ञानों की इस परंपरा में वैदिक सृष्टिविज्ञानों का संबंध कहाँ से शुरू होता है और आयुर्वेद को किस अर्थ में उपवेद कहा जासकता है। शिवाय संस्कार कर्ताओं ने आयुर्वेद प्रादुर्भाव विषयक औपदेशिक परंपरा का जो इतिहास दिया है वह कहाँ तक ठीक है। इसमें संदेह नहीं कि चरक-संहिता में आयुर्वेद के नित्यत्व के विषय में जो यह कहा गया है कि “सोऽयमायुर्वेदः; शाश्वतो निदिश्यते, अनादित्वात्, स्वभावसंश्लिष्ट-लक्षणत्वत्, भावस्वभावनित्यत्वाच्च इ०” उसकी यथार्थता इन सृष्टिविज्ञानों पर से भली भाँति विदित होसकती है।

यदि यह कहा जाय कि आयुर्वेद दर्शन, इन भिन्न २ सृष्टिविज्ञानों की गुंथी हुई माला है अथवा इनके सर्व सम्मत सिद्धांतों का निचोड़ है तो अनुचित न होगा। क्योंकि इन परिषदों में मुख्यतः इसी बात का यल हुआ कि पश्चात् का छोड़ कर एक निर्णय पर पहुंचा जाय

और उस निर्णय को आयुर्वेद सम्मत सृष्टिविज्ञान अथवा दर्शन कहा जाय। किंतु इस निर्णय को जानने के लिये यह ध्यान में रखना चाहिये कि ‘आयुर्वेद का तंत्र, आरंभ से लेकर अब तक द्रवगुण-कर्मों के जिस प्रकार के वर्गीकरण पर अवलंबित है उसका और अन्य सृष्टिविज्ञानों के सर्व सम्मत तत्वों का जिसमें समुचित समन्वय होसकता है वह ही पुनर्वसु आवेय के वक्त्यों का और इन परिघट्टों का अंतिम निष्कर्ष है’। इसतरह हम इस निर्णय पर पहुंचे कि चरक संहिता के आरंभ में जिस ‘त्रिभागात्मक सिद्धांत’ का उल्लेख है वह ही आयुर्वेद का अंतिम निर्णीत सृष्टिविज्ञान अथवा दर्शन है।

इस त्रिभागात्मक सिद्धांत के अध्यात्म में प्रजापति वाद, पञ्चधातु वाद और आत्म वाद के अध्यात्म का समन्वय है। आश्चर्य तो इस बात का है कि जो अद्वैतसिद्धांत आचार्य के नाम पर प्रसिद्ध है उसकी भी झलक इसमें दिखाई देती है। इसमें आत्मा को ज्ञाता व कर्ता माना जाता है। प्रकृति, माया अथवा हृदय का अलग उल्लेख नहीं किया जाता और न ज्ञातृत्व से कर्तृत्व का उदय ही माना जाता है। इनके मत से ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में जन्म जनक संबंध नहीं बल्कि अन्योऽन्यानुविधायित्व है। फलतः सत्व, रज, व तम को लघु, चल, व गुरु कहना इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं। और यही कारण है कि इस सिद्धांत में सत्त्वादि गुणों से शब्द स्पर्शदि तन्मात्राओं की ओर उनसे आकाशादि कौ की उत्पत्ति नहीं मानी जाती। इस सिद्धांत की दृष्टि से आकाशादि पंच महाभूत, क्रमशः अप्रतीघातकत्व, चलत्व, उष्णत्व, द्रवत्व और खरत्व मात्र हैं। पर इन गुणों का भी समन्वय वायु, अग्नि, सोम संज्ञक धर्मों में अर्थात् आत्मा के कर्तृत्व में होता है। ज्ञातृत्व इससे बिलङ्कल भिन्न है। वह केवल सत्व रजस्तमा-

त्मक सत्त्व में परिणत होता है। इस सत्त्व के ही अवस्था विशेष मन व बुद्धि हैं। इसका तत्त्व संख्यान भी चतुर्विंशतिक अथवा पंचविंशतिक नहीं है। इस सिद्धांत के सात तत्त्व हैं; आत्मा, सत्त्व, रज, तम, वायु, अग्नि, और सोम। इन को प्राण भी कहते हैं। इस त्रिभागात्मक सिद्धांत का अधिक परिचय तो ‘आयुर्वेद दर्शन के’ पठने के बाद ही होगा। प्रस्तुत में हम इतना ही व्यक्त करना चाहते हैं कि आयुर्वेद का यह सिद्धांत अपने ढंग का निराला है।

अनुमान है कि इस सिद्धांत का अविकल रूप अग्निवेश और सुश्रुत के समय में तथा आगे भी कुछ पीढ़ियों तक रहा होगा। अथवा यूँ कह सकते हैं कि अग्निवेश और सुश्रुतकृत तंत्र जबतक अलंढित विद्यमान थे तबतक आयुर्वेद दर्शन भी व्यवस्थित रूप में था। किंतु जब इन तंत्रों के पत्रे बिखरने लगे तब उसकी भी दुर्दशा हुई।

यह ऐतिहासिक सत्य है कि यज्ञः पुरुषीय परिषद में जिस सत्त्ववाद और आत्मवाद का उल्लेख है उनको तदुत्तर काल में कापिल संख्य और वेदांत का रूप प्राप्त हुआ। इनके अतिरिक्त उस नव द्रव्यवाद का भी उत्थान हुआ जिसकी सामग्री यज्ञः पुरुषीय सृष्टिविज्ञानों से ही इकट्ठा की गई थी। ये शब्दादिकों को कारण गुण मानते थे और आयुर्वेद दर्शन के साथ इनका इस विषय में ही गहरा मत भेद था। एक ओर इनका प्रचार बढ़ रहा था तो दूसरी ओर आयुर्वेद के पत्रे बिखर रहे थे। यह तो स्पष्ट ही है कि इस दुरवस्था की तह में आयुर्वेद की अमृतमयी चिकित्सा नहीं थी बल्कि इन संप्रदायों के बुद्धिवाद को अस्वीकृत करने वाला उसका सृष्टि-विज्ञान था। और यह दुरवस्था सदियों तक होती रही।

इसके बाद संस्कारकर्ताओं का समय आया । संस्कारकर्ताओं ने यद्यपि प्रधान रूप से अग्निवेश और सुश्रुत तंत्रों का संहिता करण किया तथापि वे उनका स्वरूप यथा पूर्व न रख सके । इसके अनेक कारण हैं जिनका कि कुछ परिचय आयुर्वेद दर्शन को पढ़ते र भी होसकता है । चरक संहिता में नवद्व्यवाद का और सुश्रुत संहिता में आत्मा को असर्वगत कहने वाले अंश का दिखाई देना यह सूचित करता है कि इनमें अन्यत्र के अंशों का भी संग्रह किया गया । संस्कारकर्ता यदि तपूर्व कालीन सृष्टिविज्ञानों पर उनके परस्पर विरोध पर और इस विरोध के कारण जो घटनाएँ घटी उनपर ऐतिहासिक दृष्ट्या अधिक विचार करते तो उनके द्वारा दार्शनिक अंशों का अव्यवस्थित संग्रह न होता । संभव है कि सामाजिक परिस्थिति ने उनको ऐसा न करने दिया हो ।

इस समय आयुर्वेद दर्शन के विषय में भिन्न-भिन्न मत प्रगट किये जा रहे हैं । किंतु उक्त घटनाओं पर ध्यान दिया जाय तो अव्यवस्थित बिखरे हुए दार्शनिक अंशों की व्यवस्थित संगति लभ्य जाती है और फिर मत भेद भी नहीं रहता । इस आयुर्वेद दर्शन में उसके दार्शनिक अंशों की यथामति संगति लगाकर ही उसके सर्व सम्मत सिद्धान्त को जानने का यत्न किया गया है । अतः जनता रूपी जनार्दन से सविनय प्रार्थना है कि वह इसे एक बार अपनोले ।

कई सज्जनों ने इसके पहिले ही इस विषय पर अपने विचार प्रगट किये हैं । उन विचारों में और इस आयुर्वेद दर्शन में प्रगट किये गये विचारों में अन्तर पड़ जाना स्वाभाविक है । फिर भी वे एक तो

पावित्र हृदय से प्रगट किये गये हैं दूसरे वे इसके पहिले प्रगट किये गये हैं अतः उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा कर्तव्य है । सिवाय उनके प्रति भी हम कृतज्ञ हैं जिन्होंने समय २ पर अपनी बहुमूल्य सम्पत्ति और सहायता प्रदान की । प्रेस के कर्मचारियों ने जिस सहृदयित्व से काम किया उसके लिये वे हार्दिक श्रुत्यवाद के पात्र हैं । भाषा विषयक बुटियों को तज्ञ इसलिये क्षमा करेंगे कि एक महाराष्ट्रीय के द्वारा की गई हिन्दी वाग्देवता की यह प्रेममयी पूजा है ।

श्रिमती चैत्र श्रु. १ सोमवार वि० सं. १९९४ १२ अप्रैल १९३७.

}

महादेव चन्द्रशेखर पाठक.

शुद्धिपत्र

पृष्ठपंक्तिअशुद्धशुद्ध
प्रजाप्रतिप्रजापति
१०तदनंतरतदनंतर
१०काशिषतिकाशिषति
१०ह्यतेह्यते
१५चेतस्चेतस्
२०१६यदार्थपदार्थ
३०१५कर्तृत्वकर्तृत्व
३३१२सदशसहश
३८भूमिपुभूमिपु
३८संख्येमकोत्तरसंख्येमकोत्तर
३८११चक्षेतचक्षते
३९भूतानाभूतानां
४०१५वर्गकिरणवर्गकिरण
४२रसास्तावत्रसास्तावत्
४३भूषिष्टेभूषिष्टे
४३१८गुणनांगुणानां
४४१५ऽसमत्ऽस्मात्
४४२०स्वचनुषुरःस्वचनुचरः
४८मधुरमधुर

वृद्धपांक्तिअशुद्धशुद्ध
४९१४शारीरं धातुशारीरं धातुओं
५७१७दृष्ट्यादृष्ट्या
६२२०भतपंचकभूतपंचक
७७उष्णसह्याःउष्णसह्याः
७७प्रभताप्रभूता
८३शीतात्माकशीतात्मक
८६१२यत्रेधरःयंत्रधरः
८९१३कांकायन थेकांकायन
१०३पंचपंच धातु
१०५१२मतामतो
११४१३मन कामन को
१२४ग्रजाप्रजा
१२९सष्टिसृष्टि
१३०१६अकपितअकुपित
१५२११पितपितु
१५३विनिर्णयम्विनिर्णयम्
१६८सामसोम
१६९१९घानष्टघनिष्ट
१७७२०एषाएषो
१७८इसकाइसको
१८४छीवनादिछीवनादि
१८६१५गभागर्भौ
१८७२२आमशयआमाशय

पृष्ठपंक्तिअशुद्धशुद्ध
१९०पतपित्त
१९०१८मुख( मुख
१९०२१आभषवण •अभिषवण
१९०२३EnyzmsEnzyms
१९११९पष्टिकपैष्टिक
१९२१२रजंकरजक
१९२१९अहटअहण्ट
२०४रक्तासिता, रक्ता.

क्षोष अशुद्धियों को कृपया तर्क से शुद्ध कर लिया जाय ।

विषयानुक्रमणिका.

विषय प्रवेश.

उद्देश व साधन...
यज्ञःपुरुषीय परिषद् का काल...
दार्शनिक संप्रदाय...
यज्ञःपुरुषीय परिषद्...
काशीपति ग्रामक का मुख्य खवाल व अध्यक्ष का प्रस्ताव...
परीक्षामौद्गल्य का आत्मवाद....१०
आत्मा का पुरुष-योगोत्पादकत्व...१०
चौबीस तत्व और अन्यक सहित अष्टधातु प्रकृति......११
आत्मा के बोध्दत्व, कर्तृत्व और अस्तित्व के विषय में...११
ज्ञातृत्व में कर्तृत्व का समन्वय...१४
अनादि पुरुष व समुदायात्मक पुरुष...१५
आत्मा के विभु और एक होने के विषय में...१६
आत्मा से ही बुध्दयादि सत्प्रातुओं की उत्पत्ति......१७
सत्वादि गुण बाहुल्य से आशादिकों की उत्पत्ति...१७
तन्मात्राओं के विषय में मतभेद...१८
महाभूतों के गुण व लक्षण...१९
आत्मवादियों की कुछ विशेष बातें...२०
इन्द्रियोत्पत्ति...२०

इन्द्रियों में सत्व की वृत्तियाँ...२६
मन के अस्तित्व, स्वरूप और कार्य के विषय में...२१
बुद्धि के प्रकार...२४
आत्मवाद का उपसंहार...२४
शरलोभा का सख वाद...
आत्मवादका प्रतिवाद सत्त्वेके पुरुष रोगो त्यादकत्वका समर्थन२६
सत्ववाद में आत्मा का औदासिन्य...२६
सत्ववाद का सौश्रुतिक प्रकृति पुरुष वाद से संबंध......२६
सौश्रुतिक प्रकृतिपुरुषवाद और उसकी विशेषताएँ......२७
आत्मा को असर्वगत कहनेवालों का मतभेद...३२
वायोंविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत...३४
सत्ववाद का प्रतिवाद...३४
रस के पुरुष-रोगोत्यादकत्व का समर्थन...३६
वैदिक रस अथवा सोम...३६
अगीषोम लोकपक्षियों की और वायोंविद् की दृष्टि में
रस का घर्मात्मकत्व...३७
रस के विषय में पंचात्मक लोकपक्षियों का मत...३७
रस जन्म सचेतन घटक और सचेतन घटकों का
भिन्न २ प्रकार से वर्गीकरण...३८
सचेतन द्रव्यों के वर्गीकरण में षड् रस प्रयुक्त और
गुण प्रयुक्त मतभेद...४०
पंचात्मक लोकपक्षियों की द्रव्यप्रधानता...४५
त्रिधातु सिद्धांत का आरंभ...४६

वातपित्त-क्षेप्माका ओं का इतिहास...४७
पहिला वर्गीकरण...४९
ओज, तेज व धातुप्रसाद...५१
ओज तेज ऊष्मादिकों का क्षेप्मपित्तवातों में समन्वय...५९
वासु के विषय में...६४
दूसरा वर्गीकरण...६७
वातपित्त-क्षेप्माओं की प्राकृत वैकृत अवस्थाएँ...६८
अणु अवयवों के अथवा गर्भांकुर के रासायनिक संगठन में क्षेप्मपित्तवात...७०
दोष प्रकृति...७६
वातादिकों का द्वैविध्य...८०
ब्रह्मादिगुण प्रधानता वादियों की पांचभौतिकी प्रकृति...८०
वातपित्त-क्षेप्माओं का लोकगत अधिष्ठान...८१
अशीषोसवाद...८२
वातकला कर्लीब परिषद...८५
तीसरा वर्गीकरण...९०
हरिणयाक्ष कुशिक और षड्धातुवाद...९१
रसवाद का प्रतिवाद...९१
पुरुषरोगोत्पत्ति में षड्धातुओं का समर्थन...९१
भारद्वाजीय गर्भावक्रांति का खंडन...९२
षड्धातुवादियों का सामान्य सिद्धांत...९३
चेतनाधातु...९३

गुणी चेतना धातु से आकाशादि गुणपंचक की उत्पत्ति ..... ९४

अभिव्यक्ति के समय आकाशादिकों का अप्रतीघातत्वादि मात्रत्व ..... ९६

गुर्वादि गुणों की प्रधानता ..... ९७

गुर्वादि गुणों और वातपित्त स्नेष्माओं का गुणपंचक में समन्वय ..... ९८

शब्द स्पर्शादि, ' कारण गुण ' नहीं है ..... ९८

सत्व का करणोपादानत्व और ज्ञातृत्व कर्तृत्व में जन्यजनकता का निषेध ..... ९९

मातृजादि भाव, महाभूत विकार हैं ..... ९९

इंद्रिय और इंद्रियार्थों का पांच भौतिकत्व ..... १००

षड्धातु वाद में कर्म को कृत मानते हैं ..... १०१

भद्रकाप्य का कर्मवाद ..... १०५

षड्धातुवाद का प्रतिवाद व कर्म के पुरुष रोगोत्पादकत्व का समर्थन ..... १०५

भद्रकाप्य के कर्मवाद में कर्म को 'अकृत' मानते हैं... १०५

प्रमाण चतुष्टय के द्वारा पुनर्भव की सिद्धि ..... १०६

गर्भावकांति में पुनर्भव ..... ११०

भद्रकाप्य का शब्दादि गुणप्रधान पंचात्मक लोकपक्षीयत्व १११

भारद्वाज का स्वभाववाद

कर्म का प्रतिवाद और स्वभाव का समर्थन ..... ११२

अप्रतीघातकत्वादि गुणों का 'अभूत' आकाशादिकों में | | ---|---|--- स्वभावतः अस्तित्व | ... | ११३ षड्रसों का धातुपंचक में समन्वय | ... | ११३ चेतना का अधिष्ठान अथवा चेतना, चैतस्, या मनका | | समवायिकारण | ... | ११३ गर्भोत्पादक भावों के प्रतिवाद में भारद्वाज का वक्तव्य | | ११५ दो पञ्चीकरण | ... | ११७ वातपित्तश्लेष्माओं के विषय में भारद्वाज की दृष्टि... | | ११९ गुर्वादि गुणप्रधानतावाद के आद्यप्रवर्तक भारद्वाज .... | | १२०

कांकायन का प्रजापतिवाद

स्वभाव का प्रतिवाद और प्रजापतिवाद का समर्थन१२१
वैदिक प्रजापतिवाद
प्रजापति की तीन ज्योतियाँ...१२४
वायु....१२५
अग्नि....१३०
सोम....१३२
प्रजापति का संकल्प और ज्ञातृत्व तथा कर्तृत्व में
अन्योनानुविधायित्व....१३६
प्रजापतिवाद की अन्य बातें....१३७

भिन्न आत्रेय का कालवाद

प्रजापतिवाद और काल का समर्थन...१३८
ऋतुओं के उष्णशीतवर्षलक्षणों का जीवन से संबंध....१३९
संवत्सरात्मक काल के विभाग...१३९

काल का सूर्यचंद्रवायुओं में समन्वय....१४०
,, धातुपंचक में समन्वय...१४१
,, अग्निषोम संज्ञक धर्मों में समन्वय....१४२
भिन्न अत्रिय के मत से काल अर्थात् विश्व
व्यापिनी गति....१४३
पुनर्वसु अत्रिय का निर्णय और त्रिभागात्मक सिद्धांत....१४५
पक्षराग त्याग और अध्यात्म चिंतन का उपदेश ....१४५
भावों के संपद्विषय का पुरुषरोगोत्पादकत्व....१४५
भावों के विषय में...१४६
अध्यात्म चिंतन का हेतु...१४६
भारद्वाज के प्रति उत्तर...१४७
पक्षराग त्याग का हेतु...१६१
त्रिभागात्मक सिद्धांत...१६२
त्रिभागात्मक सिद्धांत का तात्त्विक स्वरूप...१६२
ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में जन्यजनक संबंध नहीं है ......१६४
अन्योऽन्यानुविधायित्व...१६७
अत्रिय की दृष्टि से पुरुषोत्पादक भाव...१६८
तंत्र की भाषा में पुरुष की अभिदृष्टि का कारण......१६८
त्रिभागात्मक सिद्धांत को धान्वतरो की मान्यता,,
त्रिभागात्मक सिद्धांतही आयुर्वेद का निष्णात
सृष्टिविज्ञान है....१७१

परिशिष्ट

वातपित्त-क्षेग्माओं के प्रकार...१७२
वायु के प्रकार...१७३
पित्त के प्रकार...१८७
क्षेग्मा के प्रकार...२०५
सत्व के प्रकार...२१०

ग्रंथकर्ता

A black and white portrait photograph of a man with a white turban and a mustache, wearing a dark suit. The photo is framed by a thick black border.

वैद्य महादेव चंद्रशेखर पाठक