बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः ५९
प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः
इदानीं दृष्टदोषाणामपि केषांचिद्द्रव्याणां शौचमापादयितुमाह—
¹'नित्यं शुद्धः कारुहस्तः पण्यं यच्च प्रसारितम् ।
ब्रह्मचारिगतं भैक्षं नित्यं मेध्यमिति श्रुतिः ॥ १ ॥
अनु०—कारु ( कारीगर ) का हाथ नित्य शुद्ध रहता है, विक्रय के लिए फैलायी गयी वस्तु भी सदा शुद्ध होती है, तथा ब्रह्मचारी के हाथ में गया हुआ भिक्षा से प्राप्त अन्न सदैव शुद्ध होता है ऐसी वेद की उक्ति है ॥ १ ॥
हस्तादन्येन पादादिना स्पर्शने दोषः । आपणगतैः विक्रीतुं पण्यं प्रसारितम् । श्रुत्युपन्यासः सामान्यतो दृष्टथा प्रक्षाळनाद्याशङ्कानिवृत्त्यर्थः ॥ १ ॥
किञ्च—
²वत्सः प्रस्नवने मेध्यः शकुनिः फलशातने ।
स्त्रियश्च रतिसंसर्गे श्वा मृगग्रहणे शुचिः ॥ २ ॥
अनु०—दूध पेन्हाते समय ( गो को उपस्तृत करते समय ) गाय का बछड़ा शुद्ध होता है, वृक्ष से फल गिरते समय पक्षी पवित्र होता है, संभोग क्रिया के समय स्त्रियाँ पवित्र होती हैं और शिकार में मृग को पकड़ते समय कुत्ता शुद्ध होता है ॥ २ ॥
टि०—इस पद्य का भाव है कि तत्तत् क्रिया में इन प्राणियों के मुख से या श्वास, लार आदि से स्पृष्ट होने पर भी अशुद्धि का दोष नहीं होता । गो के दूध दुहते समय बछड़ा जो थन से दुग्धपान करता है उससे दुग्ध अशुद्ध नहीं माना जाता, किन्तु अन्य समय पर बछड़े के मुख से स्पृष्ट होने पर अशुद्धि मानी जाती है । कौआ आदि पक्षी यदि काटकर फल गिरावे तो वह अशुद्ध नहीं होता, किन्तु फल के गिरने पर यदि पक्षी उसे छूता है तो फल अशुद्ध माना जायगा । इसी प्रकार यदि शिकार में कुत्ता मृग आदि पशु को काटता है तो वह अशुद्ध नहीं समझा जायगा, अन्यथा कुत्ते के मुख से स्पृष्ट होने पर अशुद्धि मानी जाती है । रतिकाल में स्त्री के मुख या श्वास से स्पर्श अशुद्धिजनक नहीं होता । इस संबन्ध में गोविन्द स्वामी ने वसिष्ठधर्म सूत्र से तीन पद्य उद्धृत किये हैं ।
अत्र 'पक्षिजग्धं गवाऽऽघ्रातमवधूतंमवक्षुतम्'
१. श्लोकोऽयं समानानुपूर्वीको मनौ दृश्यते । cf. म. ५. १२९.
२. श्लोकोऽयं समानानुपूर्वीक एव वासिष्ठे दृश्यते । cf. व. ध. २८. ८. किञ्चिदेवान्यथयितो मनौ । See मनु. ५. १३०.