भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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६२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ कमण्डलुधर्या

**टी०—**यदि खलिहान में कोई ऐसा व्यक्ति जिसका अन्न अभोज्य बताया गया है अन्न उठाकर देता है तो वह अन्न दूषित नहीं माना जाता । इसी प्रकार कुएँ या तलाव से कोई इस प्रकार का व्यक्ति जल निकाल रहा हो तो वह ग्राह्य है और गाय के दुहे जाते समय दुहने के स्थान पर कोई उपर्युक्त व्यक्ति दूध देता हो तो वह दूध अशुद्ध नहीं माना जाता । गोविन्द स्वामी ने अपनी व्याख्या में यह निर्देश दिया है कि यदि पतित या चण्डाल ने इन पदार्थों में हाथ लगाया हो तो ये पदार्थ दूषित हो जाते हैं ।

अभोज्यान्नैः पुरुषैर्निष्पादितेषु खलक्षेत्रधान्यादिषु पुनश्च साधारणत्वेन सङ्कल्पितेष्वेतद् द्रष्टव्यम् । तत्राऽपि पतितचण्डालपरिगृहीतं दुष्टमेव । गोदोहन-वेलायामेव परिगृहीतं पयो भोज्यम् , गोष्ठगतत्वविधानात् ॥ ८ ॥

किञ्च—

१त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकरूपयन् ।
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ ९ ॥

**अनु०—**देवों ने ब्राह्मणों के लिये शुद्धि के तीन उपाय बनाये—प्रत्यक्षतः दोष का ज्ञान न होना, जल से प्रक्षालन तथा वाणी द्वारा प्रस्तुत पदार्थ के निर्दोष होने की प्रशंसा ॥ ९ ॥

ब्राह्मणग्रहणं प्रदर्शनार्थम् , पुराकल्पप्रशंसैषा । अदृष्टं प्रत्यक्षादिभिरनव-गतदोषम् , उपहतानुपहताशङ्कायामद्भिर्निर्णिक्के प्रक्षालितम् , तथा वाचा प्रशस्तं च । आह च वसिष्ठः—'वाचा प्रशस्तमुपयुञ्जीत' इति । वाक्प्रशस्तान्यद्भिः प्रोक्ष्योपयुञ्जीतेति ॥ ९ ॥

२आपः पवित्रं भूमिगताः गोतृप्तिर्यासु जायते ।
अव्याप्ताश्चेदमेध्येन गन्धवर्णरसान्विताः ॥ १० ॥

**अनु०—**पृथ्वी पर एकत्र हुए जिस जल से गायें अपनी प्यास बुझाती हैं, वह यदि अपवित्र पदार्थ से बहुत अधिक मिश्रित न हो, या दुर्गन्धयुक्त गँदले रंग या बुरे स्वाद का न हो तो पवित्र होता । है ॥ १० ॥

अमेध्येन पुरीषादिना । भूगुणव्यतिरिक्तगन्धवर्णरसान्विताः वर्ज्या इत्यर्थः ॥ १० ॥


१. श्लोकोऽयं समानानुपूर्वीक एव मनौ दृश्यते ॥ cf. मनु. ५. १२७.
२. श्लोकोऽयं किञ्चिदेवाऽन्यथयितो मनावुपलभ्यते । cf. मनु. ५. १२८.