भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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६८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ शरीरशुद्धिः

मृद्वाद्भिः प्रक्षालनमतिदिश्यते । 'नवपुरीषे च' इति वक्तव्ये 'तद्वत्' इत्यतिदेशो विशेषविवक्षया ॥ १३ ॥

तमाह—

पर्यायास्तिस्रः पायोः पाणेश्च ॥ १४ ॥

अनु०— ( मल त्याग कर ) पायु ( अर्थात् अपान प्रदेश ) तथा हाथों का प्रक्षालन मूत्र त्याग-विषयक प्रक्षालन के तिगुने बार प्रक्षालन किया जाता है ॥ १४ ॥

टि०— यहाँ गोविन्द स्वामी ने सूत्र में 'पायोः' पाठ ग्रहण किया है, जब कि सभी मूल पुस्तकों में 'पाद्योः' पाठ उपलब्ध होता है । मूत्र त्याग के संबन्ध में जो प्रक्षालन की विधि बतायी गयी है वह मलत्याग में तीन बार की जाय । पहले एक बार मिट्टी से अपान प्रदेश का प्रक्षालन हो फिर हाथ का, इसी प्रकार तीन बार करे । इस संबन्ध में गोविन्द स्वामी ने मनु, दक्ष, और वसिष्ठ के मतों को उद्धृत किया है ।

पायुरपानप्रदेशः । मूत्रे यदुक्तं तेन पुरीषे त्रिरावृत्तेन भवितव्यम् । पूर्वं पायोत्सकृत् मृद् दातव्या, सकृच्च पाणेः । एवं त्रिरावर्तते । तत्रैवं मानवम्—

एका लिङ्गे गुदे तिस्रस्तथैकस्मिन् करे दश ।
उभयोस्सप्त दातव्या मृदश्शुद्धिमभीप्सता ॥ इति ।

तथाऽपरं वासिष्ठं मतम्—

एका लिङ्गे तिस्रो वामे ( करे तिस्रः ) उभाभ्यां द्वे च मृत्तिके ।
पञ्चाऽपाने दशैकस्मिन्नुभयोस्सप्त मृत्तिकाः ॥ इति ।

दक्षस्तु मृत्तिकापरिमाणमुपदिशति—

अर्धप्रसृतिमात्रा तु प्रथमा मृत्तिका स्मृता ।
द्वितीया च तृतीया च तदर्धार्धा प्रकीर्तिता ॥

तत्र विरुद्धेषु विकल्पः, अविरुद्धेषु समुच्चयो द्रष्टव्यः । 'मलापकर्षणेऽमेध्यस्य' इत्येतत्तु सर्वत्र सममित्युच्यते ॥ १४ ॥

मूत्रवद्रेतस उत्सर्गे ॥ १५ ॥

अनु०— वीर्य का उत्सर्ग होने पर भी मूत्रत्याग के समान ही प्रक्षालन करे ॥ १५ ॥

शुक्रस्योत्सर्गेऽपि मूत्रवच्छौचमेव ॥ १५ ॥