भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 486 में से

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७८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [सापिण्ड्यम्]

सपिण्डेष्वादशाहमाशौचमिति जननमरणयोरधिकृत्य वदन्त्यृत्विग्दीक्षितब्रह्मचारिवर्जम् ॥ १ ॥

अनु०— जन्म और मृत्यु के समय सपिण्डों के लिए दस दिन के आशौच का विधान (धर्मशास्त्रज्ञों ने) किया है, किन्तु ऋत्विक्, सोमयज्ञ की दीक्षणीया इष्टि कर लेने वाले यज्ञकर्ता तथा ब्रह्मचारी के लिए आशौच नहीं होता ॥ १ ॥

टि०— तात्पर्य यह है कि यज्ञ कराने वाला ऋत्विक् के, सोमयज्ञ की दीक्षणीया इष्टि कर लेने वाला यज्ञकर्ता के या वेदाध्ययन करने वाले ब्रह्मचारी के सम्बन्धियों में किसी की मृत्यु हो भी जाय तो इन लोगों के लिए आशौच का नियम नहीं होता। उपर्युक्त दश दिन के आशौच का नियम ब्राह्मणवर्ण के लिए ही है। क्षत्रियों के लिए ग्यारह दिन का आशौच होता है। आशौच की अवस्था में दान आदि देने का निषेध है।

समानः पिण्डो येषां ते सपिण्डाः स्मृतिशास्त्रकाराः यद्दशाहाशौचं तदेव जननं मरणं चाऽधिकृत्य वदन्ति। न ^१सर्वं ऽप्यहाशौचवचनमपि। तथा च स्मृत्यन्तरे यदतिदेशवचनम् 'जननेऽप्येवमेव स्यात्' इति तद्दशाहस्यैवाऽतिदेशिकमिति मन्तव्यम्। आशौचे तु सम्प्राप्ते दानादिष्वनधिकारः।

तथा च वृद्धमनुः—

उभयत्र दशाऽहानि कुलस्याऽन्नं न भुज्यते।
दानं प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायश्च निवर्तते ॥
कुमारजन्मदिवसमेकं कुर्यात्प्रतिग्रहम्।
आयान्ति देवपितरस्तत्र तं बोधयन्ति च ॥
तस्मात्तद्दिवसः पुण्यः पितृवंशविवर्धनः ॥ इति ।

ब्राह्मणविषयमेतद्दशाहाशौचवचनम्। क्षत्रियादीनां तु एकादशाहादि ॥१॥

अथ सापिण्ड्यस्वरूपमाह—

^२सपिण्डता त्वासप्तमात्सपिण्डेषु ॥ २ ॥

अनु०— सपिण्डता सपिण्डों में सातवीं पीढ़ी के पुरुष तक होती है ॥ २ ॥

टि०— अपने से पहले के छठे पुरुष तक सपिण्डता मानी जाती है, इस पर आगे पुनः विचार किया गया है।

न निवर्तेत इति शेषः। तत्त्वात्मानमधिकृत्य प्रागूर्ध्वं च षट्सु पुंसु


१. सर्वत्र दशाहाशौचवचनमपि इति ग. पु.
२. सपिण्डता त्वासप्तमात्, आदन्तजननाद्योदकोपस्पर्शनम्। इति सूत्रद्वयपाठः ई.पु.