बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें८४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ आशौचविधिः
इत्युक्तवान्। तस्माज्जनने जननं मरणे मरणमिति निवेशस्सिद्धो भवति। आचार्यस्त्वनादृत्य तच्छब्दं जननमरणयोरिति वदन् विजातीयस्याऽपिप्रसङ्गं मन्यते ॥ १५ ॥
तत्र विशेषमाह—
अथ यदि दशरात्रास्सन्निपतेयुराद्यं दशरात्रमाशौचमा नवमाद् दिवसात् ॥ १६ ॥
अनु०— यदि दस ( दिन ओर ) रात्रि का आशौच काल के पूरा होने के पहले (दश दिन का या तीन रात्रियों का) दूसरा आशौच आ पड़े तो प्रथम आशौच काल ही दोनों के लिए आशौच काल होता है किन्तु ऐसी स्थिति में दूसरा आशौच कारण ( जन्म या मृत्यु ) प्रथम आशौच काल के नवें दिन से पहले ही घटित हुआ हो तभी दोनों के लिए पूर्ववर्ती आशौच काल पर्याप्त समझना चाहिये ॥ १६ ॥
आङत्राऽभिविधौ । यदि दशरात्रे वर्तमाने दशमादिवसादर्वाग्दशाहं त्रिरात्रादयो वा निपतेयुः तदा प्रक्रान्तस्य शेषेणैव शुद्धिर्भवतीत्यर्थः। दशमे चेदहनि सन्निपतेयुरन्यदाशौचं कल्प्यम् । तच्च गौतमवचनात् । स आह—'रात्रिशेषे द्वाभ्याम्, प्रभाते तिसृभिः' इति । प्रभाते प्रकर्षेण भाते दशमस्य उषःप्रभृति उदयादर्वाक् परिपात इत्यभिप्रायः । उदिते तु यथाप्राप्तमेव ॥ १६ ॥
जननमरणयोरित्युक्तं, तत्र निर्देशक्रमेण जनने तावद्विशेष उच्यते—
जनने तावन्माता पित्रोर्दशाहमाशौचम् ॥ १७ ॥
अनु०— जन्म के अवसर पर माता और पिता के लिए दस दिन का आशौच तो होता ही है ॥ १७ ॥
यदि सर्वे सपिण्डा वृत्तवन्तो भवेयुः तदा मातापित्रोरेव दशाहाशौचम् ॥ १७ ॥
अपि चेत्पिता वृत्तवान् तत्राऽऽह—
मातुरित्येके तत्परिहरणात् ॥ १८ ॥
अनु०— कुछ लोगों का मत है कि जन्म के अवसर पर आशौच केवल प्रसूतामाता के लिए ही होता है क्योंकि उसी से स्पर्शादि का परहेज रखा जाता है ॥ १८ ॥
यस्मात्प्रसूतिकां लोकः परिहरति तस्मात् तस्या एव जननाशौचं न जनकस्येति ॥ १८ ॥