बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 148, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ भक्ष्याः |
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पशवो गताः। पक्षिण आरभ्यन्ते—
पक्षिणस्तित्तिरिकपोतकपिञ्जलवार्ध्राणसमयूरवारणा वारणवर्ज्याः पञ्च विविष्किराः ॥ ७ ॥
**अनु०—**तित्तिर, कबूतर, कपिञ्जल, वार्ध्राणस, मयूर और वारण में वारण को छोड़ पांच तोड़-तोड़ कर खाने वाले पक्षी भक्ष्य होते हैं ॥ ७ ॥
**टि०—**यहाँ भी वारण पक्षी के भक्षण को सन्दिग्ध समझना चाहिए। 'भक्ष्याः प्रतुदविविष्किरजालपादाः' गौतम० २. ८. ३५, पृ० १८८ ।
अस्मिन्नपि षट्के वारणे विकल्पः। विकीर्य विकोर्य भक्षयन्तीति विविष्किराः। अन्यत्पूर्ववत् ॥ ७ ॥
मत्स्यास्सहस्रदंष्ट्रचिलिचिमो वर्मी बृहच्छिरोरोमशकरिरोहितराजीवाः ॥ ८ ॥
**अनु—**सहस्रदंष्ट्र, चिलिचिम, वर्मी, बृहच्छिरस्, रोमशकरि, रोहित और राजीव मछलियाँ भक्ष्य होती हैं ॥ ८ ॥
**टि०—**वसिष्ठ १४-४१-४२ में इन मत्स्यों के भक्ष्य होने का नियम है। नामों के विषय में विभिन्न पुस्तकों में कुछ अन्तर है, उदाहरण के लिए सूत्र के प्रस्तुत पाठ में 'रोमशकरि' नाम उपलब्ध है, किन्तु 'मशकरि' नाम भी कुछ लोगों ने ग्रहण किया है। द्र० व्यूहलेर की टिप्पणी। गोविन्द स्वामी ने भी इन नामों को स्पष्ट न कर लिखा है कि इनके विषय में निषादों आदि से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
भक्ष्या इत्यनुवर्तते। उक्तेषु पशुमृगपक्षिमत्स्येषु अप्रसिद्धनामकाः निषादेभ्योऽवगन्तव्याः ॥ ८ ॥
उक्तो जङ्गमेषु भक्षणविशेषः। अथ स्थावरेष्वाह—
अनिर्दशाहसन्धिनीक्षीरमपेयम् ॥ ६ ॥
**अनु०—**जिस गाय, भैंस, बकरी आदि को ब्याए हुए दस दिन न हुए हों अथवा जो गर्भिणी अवस्था में दुही जा रही हो उसका दूध अपेय होता है ॥ ९ ॥
**टि०—**द्रष्टव्य वसिष्ठ १४. ३४-३५; गौतम० २. ८. २२ 'गोश्च क्षीरमनिर्दशायाः सुतके' २३, अजामहिष्योश्च, २५ 'स्यन्दिनीयामसुसंधिनीनां च'। संधिनी की गोविन्द स्वामी की व्याख्या स्पष्ट है: जो गर्भिणी स्थिति में दुही जाती है और प्रातः न दुहने पर सायं दुही जाती है। स्थानीय बोलियों में ऐसी गायों के विशेष नाम होते हैं।
गोमहिष्यजानामिति शेषः। प्रसवादारभ्य नातिक्रान्तदशाहमनिर्दशाहं क्षीरम्। सन्धिनी पुनः या गर्भिणी दुह्यते या वा सायमदुग्धा प्रातर्दुह्यते प्रातर्दुग्धा वा सायंम् ॥ ९ ॥