बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ बौधायन-धर्मसूत्रम् · [ दीक्षितनियमाः
'न मन्त्रवता यज्ञाङ्गेनाऽऽत्मानमभिपरिहरेत् ॥ ७ ॥
**अनु०—**यज्ञ के किसी ऐसे उपकरण को, जिसका प्रयोग मन्त्रोच्चारण के साथ किया जाता हो, अपने को बीच में कर अग्नि से दूर न करे ॥ ७ ॥
**टि०—**उपर्युक्त अर्थ गोविन्द स्वामी की व्याख्या के आधार पर है। ब्यूहलेर ने 'अपने चारो ओर न घुमाए' ऐसा अर्थ किया है। किन्तु अगले सूत्र को देखने पर गोविन्द स्वामी का अर्थ संगत प्रतीत होता है।
मन्त्रवद्यज्ञाङ्गं स्रुक्स्रुवादि। तेनाऽऽत्मानं नाऽभिपरिहरेत् आत्मनो बहिर्न कुर्यादग्नेः पात्रस्य चान्तरतस्स्वयं न भवेदिति यावत् ॥ - ॥
तत्र कारणमाह—
अभ्यन्तराणि यज्ञाङ्गानि ॥ ८ ॥
**अनु०—**यज्ञ के उपकरण ( यज्ञ से ऋत्विक की अपेक्षा ) अधिक निकट रूप से संबद्ध होते हैं ॥ ८ ॥
ऋत्विगपेक्षयेति शेषः ॥ ८ ॥
^१बाह्या ऋत्विजः ॥ ९ ॥
**अनु०—**और ऋत्विज् ( यज्ञ के उपकरणों की अपेक्षा अधिक ) दूरवर्ती होते हैं ॥ ९ ॥
प्रयोगाङ्गत्वात् यज्ञाङ्गापेक्षयेति शेषः ॥ ९ ॥
पत्नीयजमानावृत्विग्भ्योऽन्तरतमौ ॥ १० ॥
**अनु०—**यजमान और उसकी पत्नी ( यज्ञ से ) ऋत्विक् की अपेक्षा अधिक निकटतया संबद्ध होते हैं ॥ १० ॥
फलप्रतिग्रहीतृत्वादनयोः । उदाहरणानि^२ वैसर्जनानि दाक्षिणानि च ॥ १० ॥
अथेदानीममनुष्येषु बाह्याभ्यन्तरमाह—
यज्ञाङ्गेभ्य आज्यमाज्याद्धवींषि हविर्भ्यः पशुः पशोस्सोमस्सोमादग्नयः ॥ ११ ॥
१. Compare these three Sutras with आपस्तम्बयज्ञपरिभाषासूत्र ( आप. श्रौ. २४.२.१३.१४. )
२. "गार्हपत्ये आज्यं विलाप्योत्पूय स्रुचि चतुर्गृहीतं गृहीत्वा शालामुखीये वैसर्जनानि जुहोति" इति विहितो होमो वैसर्जनहोमः।