भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 486 में से

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व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातूकर्ण्यः कपिञ्जलः ।
बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च ।
पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृति विधायकाः ॥

वीरमित्रोदय के परिभाषा प्रकरण के अनुसार स्मृतिकारों की संख्या २१ है—
वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः ।
विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥
जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥
पारस्करश्चप्यर्य ॠक्षो बैजवापस्तथैव च ।
इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥

सामान्यतः स्मृति नाम से अभिहित रचनाओं एवं धर्मसूत्रों में जो अन्तर हैं उनको महामहोपाध्याय काणे ने अपने धर्मशास्त्र के इतिहास में स्पष्ट किया है, जिसे हम यहाँ साभार प्रस्तुत करते हैं—

१—अनेक धर्मसूत्र किसी चरण के या किसी कल्प के अङ्ग हैं, अथवा उनका गहरा सम्बन्ध गृह्यसूत्रों से है।
२—धर्मसूत्रों में यत्र-तत्र अपने चरण के साहित्य और वेद के उद्धरण दिये गये हैं।
३—धर्मसूत्र प्रायः गद्य में हैं या कहीं-कहीं मिश्रित गद्य या पद्य में हैं, किन्तु स्मृतियाँ श्लोकों में हैं या पद्यबद्ध हैं।
४—भाषा की दृष्टि से धर्मसूत्र स्मृतियों के पहले के हैं, और स्मृतियों की भाषा अपेक्षाकृत अर्वाचीन है।
५—विषयवस्तु के विन्यास की दृष्टि से भी धर्मसूत्र और स्मृतियों में अन्तर है। धर्मसूत्रों में प्रायः विषय की व्यवस्था, क्रम का अनुसरण नहीं करतीं, किन्तु स्मृतियाँ अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं, उनमें विषयवस्तु मुख्यतः तीन शीर्षकों में विभक्त हैं—आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त।
६—बहुत बड़ी संख्या में धर्मसूत्र अधिकतम स्मृतियों से प्राचीन हैं।

भारतीय धर्म

भारतीय परम्परा में 'धर्म' शब्द के अर्थ में अद्भुत विकास हुआ है। सर्वप्रथम, ऋग्वेद में 'धर्म' का प्रयोग विशेषण या संज्ञा के रूप में हुआ है और प्रायः 'धर्मन्' के रूप में यह नपुंसकलिंग है। ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद, वाजसनेयि-संहिता में भी 'धर्मन्' का प्रयोग अनेकशः हुआ है। 'धर्म' शब्द का प्रयोग अथर्ववेद, तैत्तिरीय-संहिता तथा वाजसनेयिसंहिता में हुआ है। इन प्रयोगों में प्रायः स्थलों पर धर्म का अर्थ है धार्मिक विधि, धार्मिक क्रिया, शाश्वत नियम, आचरण के नियम।

संहिताओं के परवर्त्ती काल में 'धर्म' शब्द का अर्थ वर्णाश्रम की विधियों के निकट आ गया है। उपनिषद् काल में 'धर्म' का अर्थ स्पष्टतः वर्णों एवम् आश्रमों के आचार एवं संस्कार ही था, जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् के निम्नलिखित अंश से प्रकट है—

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