बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 229, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १७७
अनु०— पातक का मिथ्या दोष लगाने वाला एक वर्ष तक कृच्छ्र व्रत करे।२२।
तदिति कृच्छ्रं प्रतिनिर्दिशति । ब्राह्मणमनृतेन पातकेनाभिशंस्य संवत्सरं प्राजापत्यव्रतं चरेत् । अत्र गौतमः—'ब्राह्मणाभिशंसने दोषस्तावत् । द्विरनेन-सि' इति ॥ २२ ॥
पतितसम्पयोगे सति कियता कालेन केन सम्प्रयोगेण पततीति ? तदुभयं वक्ति—
संवत्सरेण पतति पतितेन समाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनादिति ॥ २३ ॥
अनु०— जो व्यक्ति पतित के साथ एक वर्ष तक संबन्ध बनाये रखता है वह भी पतित हो जाता है, पतित का यज्ञ कराने, उसका अध्यापन करने या उससे वैवाहिक संबन्ध स्थापित करने से नहीं, अपितु उसके साथ एक सवारी पर चलने, एक साथ बैठने, एक साथ भोजन करने से ही पतित हो जाता है ॥ २३ ॥
यानासनाशनानैस्संवत्सरेण पतति । न तु याजनादिभिस्संवत्सरेण । किं तर्हि ? सम्बन्धमात्रेण, सद्य एवेत्यर्थः । अन्तरङ्गत्वात् याजनादीनां बहिरङ्ग-त्वाच्च यानादीनाम् । तस्माद्युक्ता योजना । याजनं नाम ऋत्विग्यजमानस-म्बन्धः । शिष्योपाध्यायसम्बन्धोऽध्यापनम् । कन्यादानप्रतिग्रहलक्षणसम्बन्धो यौनम् । यानाद्येकस्यां शालायामेकस्मिन् कुञ्जरे खट्वायाँ वा ॥ २३ ॥
१अमेध्यप्राशने प्रायश्चित्तं नैष्पुरीष्यं तत्सप्तरात्रेणाऽवाप्यते । २अपः पयो घृतं पराक इति प्रतित्र्यहमुष्णानि स तप्तकृच्छ्रः ॥ २४ ॥
अनु०— अमेध्य वस्तुओं को खा लेने का प्रायश्चित्त यह है कि जब तक पेट का मल पूर्णतः शरीर से बाहर नहीं निकल जाता तब तक उपवास करे, सात दिन रात में मलोत्सर्ग द्वारा पूर्णतः शुद्धि होती है। जल, दूध और घृत को उष्ण कर तीन-तीन दिन सेवन करते हुए पुनः तीन दिन उपवास करे तो वह तप्तकृच्छ्र नामक व्रत होता है ॥ २४ ॥
अमेध्यशब्देन श्वापदोष्ट्रखरादीनां मांसं लशुनगृञ्जनपलाण्डुकवकाद्-यश्च गृह्यन्ते । अबादीनि त्रीण्युष्णानि । पराक उपवासः प्रतित्र्यहम् । एवमे-कैकस्मिन् कृते सति द्वादश सम्पद्यन्ते । तस्यैतस्य तप्तकृच्छ्र इति संज्ञा ॥ २४ ॥
१. See, आप. ध. १. २७. ३. and गौ. ध. २१. ४
२. See. याज्ञवल्क्य. ३. ३२७. and मनु also. ११; २१४.
१५ बौ०ध०