बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८८ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ पुत्रभेदाः
अनु०—विवाह के समय ही यदि वधू ज्ञात या अज्ञात रूप से गर्भिणी हो तो उससे उत्पन्न पुत्र को सहोढ कहते हैं ॥ २५ ॥
या गूढगर्भिणी सती परिणीयते तस्यां यो जातस्स सहोढो नाम । वोढुश्चायं पुत्रः । विज्ञातायां तु संस्कार एनोऽस्ति ॥ २५ ॥
मातापित्रोर्हस्तात्क्रीतोऽन्यतरेण वा योऽपत्यार्थे परिगृह्यते स क्रीतः ॥ २६ ॥
अनु०—जो पुत्र माता और पिता को धन देकर खरीदा जाता है या उनमें से किसी एक द्वारा बेचा जाकर पुत्र के रूप में ग्रहण किया जाता है उसे क्रीत कहते हैं ॥ २६ ॥
स्वद्रव्यं प्रदायेति शेषः ॥ २६ ॥
क्लीवं त्यक्त्वा पतितं वा याऽन्यं पतिं विन्देत्तस्यां पुनर्भ्वां यो जातस्स पौनर्भवः ॥ २७ ॥
अनु०—नपुंसक या पतित पति को छोड़कर दूसरे पुरुष से विवाह करने वाली स्त्री से जो पुत्र उत्पन्न होता है उसको पौनर्भव कहते हैं ॥ २७ ॥
टि०—यहां पति के मृत होने पर दूसरा विवाह करने वाली स्त्री से भी अर्थ लेना चाहिए ।
मृतोऽप्यत्राऽभ्यनुज्ञातः । तथा च वसिष्ठः—'मृते वा सा पुनर्भूर्भवति' इति ॥ २७ ॥
मातापितृविहीनो यः स्वयमात्मानं दद्यात्स स्वयंदत्तः ॥ २८ ॥
अनु०—माता और पिता से विहीन होकर जो स्वयं को पुत्र के रूप में अर्पित करता है उसे स्वयं दत्त कहते हैं ॥ २८ ॥
स्वस्वत्वनिवृत्तिः परस्वत्वापादनं च दानम् । अत्राऽपि शरीरेन्द्रियाणामा-त्मीयत्वाद्दानव्यवहारः ॥ २८ ॥
द्विजातिप्रवराच्छूद्रायां जातो निषादः ॥ २९ ॥
अनु०—द्विजातियों में प्रथम वर्ण अर्थात् ब्राह्मण द्वारा शूद्रा स्त्री से उत्पन्न किये गये पुत्र को निषाद कहते हैं ॥ २९ ॥
द्विजातिप्रवरो ब्राह्मणः ॥ २९ ॥
कामात्पारशव इति पुत्राः ॥ ३० ॥