बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| १९६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ प्रायश्चित्तम्. |
|---|
लपेटकर अग्नि में प्रक्षेप का तथा क्षत्रिय को सरपत में लपेटकर अग्नि में झोंकने का दण्ड है—गोविन्दस्वामी।
अब्राह्मणः क्षत्रियः वैश्यश्च। तयोश्शारीरो दण्डः अग्नौ प्रक्षेपः कर्तव्यः। क्व ? संग्रहेणे पारदार्ये। निगुप्तब्राह्मणीगमने मतिपूर्वे वैश्यो लोहितदर्भैर्वे- ष्टयित्वाऽग्नौ प्रक्षेपव्यः। राजन्यश्शरपत्रैरिति ॥ १ ॥
अथ प्रपञ्चः—
सर्वेषामेव वर्णानां दारा रक्ष्यतमा धनात् ॥ २ ॥
**अनु०—**सभी वर्णों के पुरुषों के लिए पत्नियां धन की अपेक्षा भी अधिक साव- धानी से रक्षणीय होती हैं ॥ २ ॥
अपोति शेषः ॥ २ ॥
अब्राह्मणवध उक्तः। अत्राऽपवदति—
न तु चारणदारेषु न रङ्गावतारे वधः । संसर्जयन्ति ता ह्येतान्निगुप्तांश्चालयन्त्यपि ॥ ३ ॥
**अनु०—**किन्तु चारणों की पत्नियों तथा रंगमंच पर नृत्य अभिनय करने वाली नर्तकियों से यौनसंबंध करने पर वध का दण्ड नहीं होता है। क्योंकि ऐसी स्त्रियों के पुरुष ही उनका संबन्ध दूसरे पुरुषों से कराते हैं या घर के भीतर भी उन्हें दूसरे पुरुषों से (धन आदि के लिए) यौनसंबन्ध करने की छूट देते हैं ॥ ३ ॥
**टि०—**गोविन्दस्वामी के अनुसार चारणदारा देवदासी को कह सकते हैं। रंगा- वतार से वेश्याओं से तात्पर्य है, जो नृत्य आदि द्वारा जीविकोपार्जन करती हैं। इन स्त्रियों के साथ व्यभिचार का दोष इसलिए नहीं माना गया है कि इनके पुरुष इस विषय में आपत्ति नहीं करते, अपितु धनलिप्सा से स्वयं ही इनका संबन्ध दूसरे पुरुषों से कराते हैं। किन्तु वेश्यागमन के संबन्ध में भी प्रायश्चित्त का अन्यत्र विधान किया गया है—
“पशुं वेश्यां च यो गच्छेत्प्राजापत्येन शुद्धयति”
चारणदाराः देवदास्यः। रङ्गावतारः पण्यस्त्रियः। तासु सङ्ग्रहणे वधो न कर्तव्यः। येन तास्संसर्जयन्ति सम्बन्धयन्ति आत्मना निगुप्तान् रक्षितानपि पुंसो द्रव्यलिप्सया। तानेव क्षीणद्रव्यांश्चालयन्ति उत्सृजन्ति च। एवंस्वभाव- त्वात्तासां तद्गमने प्रायश्चित्तमप्यल्पमेव। ‘पशुं वेश्यां च यो गच्छेत्प्राजा- पत्येन शुद्धयति’ इति। तथाऽन्यत्राऽपि--