भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 486 में से

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पृष्ठ 275

सप्तमः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः २२३

तस्मादिति माङ्गल्यहेतुतामुपदर्शयति । सन्ध्योपासनं हि सर्वेभ्यः कर्मभ्यो मङ्गलतरम् । सन्ध्या नाम रात्रेर्वासरस्य चाऽन्तरालकालवर्ति सूर्योपासनम् । तत्र प्रणवव्याहृतिसहितस्तत्स वितुरिति मन्त्रोच्चारणजन्यस्तद्विषयस्सन्ततो मानसो व्यापारः । इदमेवाऽत्र प्रधानम् । यदन्यत्तदङ्गम् । तथा च ब्राह्मणम्- 'उद्यन्तमस्तं यन्तमादित्यमभिध्यायन् कुर्वन् ब्राह्मणो विद्वान् सकलं भद्रमश्नुते' इति । कुर्वन् प्रदक्षिणं मन्त्रोच्चारणं वा । ब्राह्मणग्रहणं ऋणश्रुतिवत् । विधि-मनुष्ठानक्रमं वक्ष्याम इति सङ्ग्रहः कृतः । तत्र कालो वक्ष्यते—'सुपूर्वामपि-पूर्वामुपक्रम्य' (२-७-१२ ) इत्यत्र ॥ १ ॥

तीर्थं गत्वाऽप्रयतोऽभिषिक्तः प्रयतो वाऽनभिषिक्तः प्रक्षालित-पादपाणिरप आचम्य सुरभिमत्याऽब्लिङ्गाभिर्वारुणीभिर्हिरण्यवर्णाभिः पावमानीभिर्व्याहृतिभिरन्यैश्च पवित्रैरात्मानं प्रोक्ष्य प्रयतो भवति ॥२॥

अनु०—पवित्र जलाशय पर जाकर अशुद्ध होने पर स्नान कर और शुद्ध होने पर बिना स्नान किये भी, पैरों और हाथों को धोकर, आचमन कर, 'सुरभि' शब्द से युक्त ऋग्वेद के मन्त्र का उच्चारण करते हुए, अप् देवता के मन्त्रों से, वरुण देवता के मन्त्रों से हिरण्यवर्ण इत्यादि मन्त्रों से, 'पवमानः सुवर्चनः' इस अनुवाक् से, व्याहृतियों से तथा अन्य पवित्र करने वाले मन्त्रों से अपने ऊपर जल छिड़के और शुद्ध होवे॥२॥

टि०—तीर्थं से नदी, पवित्र जलाशय से तात्पर्य है । विकल्प का नियम केवल स्नान के विषय में समझना चाहिए । हाथों और पैरों के धोने का नियम दोनों ही स्थितियों में होता है, चाहे स्नान किये हो या न किये हो ।

हाथ को कलाई तक धोने का नियम है । आचमन मन्त्रोच्चारण के साथ होता है । सायंकाल आचमन का मन्त्र है 'अग्निश्च मा मन्युश्च' और प्रातःकालीन आचमन का मन्त्र है 'सूर्यश्च मा मन्युश्च' । स्नान भी 'हिरण्यशृङ्गम्' आदि मन्त्र से होता है । 'सुरभि' शब्द वाला मन्त्र 'दधिक्राव्णः' आदि है । 'आपो हि' इत्यादि तीन मन्त्र अब्दिङ्ग हैं । वरुण देवता के मन्त्र 'यच्चिद्धि ते' आदि तीन मन्त्र, अथवा कुछ लोगों के अनुसार 'अव ते हेड' ' इमं मे वरुण' मन्त्र है । 'हिरण्यवर्णाः' इत्यादि चार मन्त्र हैं । ये मन्त्र पूर्णतः इस प्रकार हैं”

अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः । पापेभ्यो रक्षन्ताम् । यदह्ना पापम-कार्षम् । मनसा वाचा हस्ताभ्याम् । पद्भ्यामुदरेण शिश्ना । अहस्तदवलुम्पतु यत्कि-ञ्च दुरितं मयि । इदमहं माममृतयोनौ । सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥

सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः । पापेभ्यो रक्षन्ताम् । यद्रात्र्या पापमकार्षम् । मनसा वाचा हस्ताभ्याम् । पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु।

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