भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

एकादशः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः २४७

अनु०—प्रतिदिन प्रणव से आरम्भ कर वेद का स्वाध्याय करे और इस प्रकार ब्रह्मयज्ञ का अनुष्ठान करे ॥ ६ ॥

ब्रह्मयज्ञः कर्तव्यः ब्रह्मैव यज्ञस्स च यागः ॥ ६ ॥

तदाह—

स्वाध्यायो वै ब्रह्मयज्ञः१ ॥ ७ ॥

अनु०—वेद का स्वाध्याय ही ब्रह्मयज्ञ है ॥ ७ ॥

ऋङ्वेतत् ॥ ७ ॥

'तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मयज्ञस्य वागेव जुहूर्मन उपभृच्चक्षुर्ध्रुवा मेधा स्रुवः सत्यमवभृथस्स्वर्गो लोक उदयनं यावन्तं ह वा इमां वित्तस्य पूर्णां ददत्स्वर्गं लोकं जयति भूयांसं चाऽक्षय्यं चाऽप पुनर्मृत्युं जयति य एवं विद्वान् स्वाध्यायमधीते ॥ ८ ॥

अनु०—इस स्वाध्यायरूपी ब्रह्मयज्ञ का वाणी ही जुहू है, मन उपभृत् है, चक्षु ध्रुवा के स्थान पर होता है, बुद्धि स्रुवा का कार्य करती है सत्य अवभृथ है और स्वर्ग लोक उदयन या यज्ञ की परिसमाप्ति है । जितना स्वर्गफल इस धन-धान्यपूर्ण सम्पूर्ण पृथ्वी का दान करने वाला पाता है उतना, किंवा उससे भी अधिक स्वर्गफल, वह व्यक्ति प्राप्त करता है, जो इस प्रकार ज्ञान-सम्पन्न हो, स्वाध्याय करता है और वह अक्षय्य मोक्ष प्राप्त करता है, पुनर्मरण पर विजय कर लेता है ॥ ८ ॥

टि०— इस सूत्र का पूर्वार्द्ध शतपथ ब्राह्मण ११.५.६.२ से तथा उत्तरार्द्ध तैत्तिरीय आरण्यक २.१७ से उद्धृत है।

उपमेयम्, उपासना वा । यस्मिन् तत्तद्भावयेदित्यर्थः । वाचि जुहूबुद्धिमित्यादि । उदयनं परिसमाप्तिः । एतस्मादपि प्रायणोऽप्युन्नेयः । प्रारम्भापेक्षत्वात् परिसमाप्तेः । तदानीमस्मिन् लोके प्रायणीयबुद्धिः । वित्तस्य वित्तेन धनेन स्वाध्याययज्ञेन स्वाध्याययज्ञमुपासिता जयति ततोऽपि भूयांसमक्षय्यमनन्तमपवर्गं मोक्षमित्यर्थः । अपमृत्युरकालमरणम् ॥ ८ ॥

अथ निगमनम्—

तस्मात्स्वाध्यायोऽध्येतव्य इति हि ब्राह्मणम् ॥ ९ ॥


१. अत्र सूत्रे 'तस्य' इत्यारभ्य 'उदयनं' इत्येतत्पर्यन्तं शतपथब्राह्मणस्थं वाक्यम् । 'यावन्तं ह वा' इत्यारभ्य 'पुनर्मृत्युं जयति' पर्यन्तं तैत्तिरीयारण्यकस्थम् ( तै. आ. २. १४) ततः पुनश्शतपथस्थम् ॥