बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| २९८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [संन्यासिनियमाः |
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तत्र तद्विशेषमन्यमुपदिशन्ति स्म। स्थानं हिमोत्सङ्गः। मौनं वाक्संयमः स्वाध्यायोडपि। वीरासनमेकरूपेणाऽऽसनम्। रात्राविति शेषः। चतुर्थषष्ठाष्टमकालता एकाद्वयहत्र्यहातिक्रमः व्रतमनशनं त्रिभिस्सम्बध्यते ॥ १७ ॥
कणपिण्याकयावकदधिपयोव्रतत्वं चेति ॥१८॥
अनु०— चावल के कण तिल का बना पिण्याक, जो से बने हुए भोजन दही और दूध का ही भक्षण करे ॥ १८ ॥
कणास्तण्डुलावयवाः। पिण्याकं तिलपिष्टम्। यवतण्डुलपक्वौदनः यवागूर्वा यावकम्। सममन्यत् ॥ १८ ॥
तत्र मौने युक्तस्त्रैविद्यवृद्धैराचार्यैर्मुनिभि १रन्यैर्वाऽऽश्रमिभिर्बहुश्रुतैर्दन्तान् सन्धायाऽन्तर्मुख एव यावदर्थं सम्भाषीत न यत्र लोपो भवतीति विज्ञायते ॥ १९ ॥
अनु०— इस समय मौन व्रत का पालन करते हुए भी तीनों वेदों के गम्भीर विद्वानों, आचार्यों, मुनियों, अत्यन्त विद्वान् नैष्ठिक ब्रह्मचारियों या तपस्वियों के साथ दाँतों को दबाए हुए ही, मुख के भीतर ही जितना आवश्यक हो उतना ही बोले, इस प्रकार व्रत का लोप नही होता, ऐसा वेद के अनुसार ज्ञात है ॥ १९ ॥
त्रयी ग्रन्थतोऽर्थतश्च यैस्समधिगता, ते त्रैविद्यवृद्धाः अत्रैविद्यवृद्धा अप्याचार्याः। मुनयः परिव्राजकाः। अन्याश्रमग्रहणान्नैष्ठिकतापसयोर्ग्रहण्म्। दन्तैर्दन्तानिति; सम्भाष्यादन्यो यथा न शृणुयादित्यर्थः ॥ १९ ॥
सर्वत्राऽशक्तावाह—
स्थानमौनवीरासनानामन्यतमेन सम्प्रयोगो न त्रयं सन्निपातयेत् ॥२०॥
अनु०— दिन में खड़ा रहना, मौन रहना, रात्रि में एक प्रकार से बैठे रहना इनमें से किसी एक व्रत का पालन करे, तीनों व्रतों का एक साथ पालन न करे ॥२०॥
वक्ष्यमाणं यत्तदपेक्षणीयम् ॥ २० ॥
अथ व्रतविषय एव किंचिदुच्यते —
यत्र गतश्च यावन्मात्रमनुव्रतयेदापत्सु न यत्र लोपो भवतीति विज्ञायते ॥ २१ ॥
अनु०— जहां गया हो वहाँ मात्रा के अनुसार भक्षण करे। प्राणसंकट होने पर
१. आरण्यैः इति, क. पु.