भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

चतुर्थः खण्डः ] तृतीयप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः ३२१

अनु०—पशुओं के साथ विचरण करना, उन्हीं के साथ निवास करना, उन्हीं के समान जीवन वृत्ति का आश्रय लेना स्वर्ग का प्रत्यक्ष लक्षण होता है ॥ २३ ॥

फलार्थवादोऽयम् ॥

इति तृतीयप्रश्ने तृतीयः खण्डः तृतीयोऽध्यायश्च ।


तृतीयप्रश्ने चतुर्थोऽध्यायः

चतुर्थः खण्डः

उक्तं च ब्रह्मचर्यम् —

अथ यदि ब्रह्मचार्यव्रत्यमिव चरेत् ॥ १ ॥

अनु०—यदि ब्रह्मचारी अपने व्रत के विरुद्ध कोई कार्य करता है तो उसके संबन्ध में नियम यहाँ बताया जायगा ॥ १ ॥

व्रतं नियमस्तस्मै हितं व्रत्यं तदभावोऽव्रत्यम् । ब्रह्मचारिग्रहणं प्रदर्शनार्थम् । यस्य यस्मिन् काले ब्रह्मचर्यं चोदितमपि गृहस्थस्य भिक्षावर्जमस्याऽऽश्रमिणो वक्ष्यमाणे कर्मण्यधिकारः ॥ १ ॥

किं किं पुनरव्रत्यमित्याह—

मांसमश्नीयात् स्त्रियं वोपेयात् सर्वास्वेवाऽऽर्त्तिषु ॥ २ ॥

अनु०—यदि ब्रह्मचारी मांस भक्षण कर लेता है, स्त्री से संभोग कर लेता है, अथवा सभी प्रकार के व्रत भंग के समय निम्नलिखित कर्म करे ॥ २ ॥

अव्रत्यानि परिभाषायां प्रपञ्चितानि—'अथोपनीतस्याऽव्रत्यानि भवन्ति नाऽन्यस्योच्छिष्टं भुञ्जीत' इत्यादि । अत्र तेषां दिङ्मात्रं प्रदर्शितम् । तत्र हि पुनरुपनयनं नैमित्तिकत्वेन विहितम् । इह तु होमः । अनयोश्शक्तिबुद्धिपूर्वव्यपेक्षया विकल्पसमुच्चयौ द्रष्टव्यौ । सर्वास्वेवार्तिषु प्रदेशेषु ॥ २ ॥

अन्तराजगारेऽग्निमुपसमाधाय सम्परिस्तीर्याऽऽग्निमुखात् कृत्वाऽथाज्याहुतीरुपजुहोति ॥ ३ ॥

अनु०—घर के भीतर अग्नि के ऊपर समिध् रखकर उसका उपसमाधान करे; उसके चारो ओर कुश घास फैलावे, अग्निमुख तक की (दर्विहोमिक) क्रियाओं को कर घृत की आहुतियां इन मन्त्रों के साथ करे ॥ ३ ॥

२४ बौ० ध०