बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३८२ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [शीघ्रफलदायककर्माणि |
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¹जपहोमेष्टियन्त्राद्यैः शोधयित्वा स्वविग्रहम् ।
साधयेत्सर्वकर्माणि नाऽन्यथा सिद्धिमश्नुते ॥ २ ॥
अनु०—अब मैं साम, ऋक्, यजु और अथर्वण से संबद्ध जिन कर्मों से मनुष्य शीघ्र अपने मन की इच्छाओं को कर सकता है, उन कर्मों का विवेचन करूँगा ॥१॥
अनु०—जप, होम, इष्टि, संयम के अभ्यास आदि द्वारा अपने शरीर को पवित्र कर सभी कर्मों को सम्पन्न करे, अन्यथा अपने प्रयोजन में सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता ॥ २ ॥
अथशब्द आनन्तर्ये प्रकाशरहस्यप्रायश्चित्तानन्तरम् । यद्वा—मङ्गलार्थवाची, यस्मान्मङ्गलवाक्यानि जपादीनि अतस्तानि सम्प्रवक्ष्यामि । तानि विशि-नष्टि--यैः जपादिभिश्रुद्धोऽनुष्ठितैः सामवेदादिविहितैः कर्मभिर्मनोगतान-भिप्रेतान् कामान् फलान्यवाप्नोतीति ॥ १, २ ॥
एवं पापविशेषं समुदाहृत्य यद्विधीयते तत्रैवमुक्तम् । कर्माथी जपादि चिकीर्षोर्नियमानाह त्रिभिश्लोकैः—
जपहोमेष्टियन्त्राणि करिष्यन्नादितो द्विजः ।
शुक्लपुण्यदिनर्क्षेषु केशश्मश्रूणि वापयेत् ॥ ३ ॥
स्नायात्त्रिषवणं पायादात्मानं क्रोधतोऽनृतात् ।
स्त्रीशूद्रैर्नाऽभिभाषेत ब्रह्मचारी हविर्व्रतः ॥ ३ ॥
गोविप्रपितृदेवेभ्यो नमस्कुर्वन् दिवाऽस्वपन् ।
जपहोमेष्टियन्त्रस्थो दिवास्थानो निशासनः ॥ ५ ॥
अनु०—जो द्विज जप, होम, इष्ट और इन्द्रियादि के संयम का अभ्यास करने के लिए तैयारी कर रहा हो, वह सबसे पहले शुक्ल पक्ष में किसी शुभ दिन को शुभ नक्षत्र में केशों और दाढ़ी-मूँछ की मुँड़ा डाले ॥ ३-५ ॥
अनु०—वह व्यक्ति प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल तीनों सवनों में स्नान करे; क्रोध और असत्यभाषण से अपने को बचाए । स्त्रियों और शूद्रों से स्वयं संबोधित कर भाषण न करे, ब्रह्मचारी रहे और यज्ञ के योग्य हवि के अन्न का ही भोजन करे ॥ ४ ॥
अनु०—गायों, ब्राह्मणों, पितृ, देवों को नमस्कार करे और दिन में न सोये । जब तक जप, होम, इष्टि या संयम का अभ्यास करे तब तक दिन में खड़ा रहे और रात को बैठकर बिताये ॥ ५ ॥
१. श्लोकोऽयं ख. ग. पुस्तकेयोर्नाऽस्ति ।