बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
DevanagariHindipublished486 पृष्ठ
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४१४ | बौधायन-धर्मसूत्रम्
| उद्धरण | सन्दर्भ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| तत् सवितुः | याज्ञिकी ४२. | २२७ |
| तद्यथेषीकातूलमग्नौ | छा. उ. ५. २४. | २६४ |
| तप्तकृच्छ्रं चरन् | मनु ११. २१४. | ३८६ |
| तस्माद्गुरुकुले तिष्ठन् | श्लो. वा. १. १. १. | ३५ |
| तस्मात्तद्विसः पुण्यः | वृद्धमनुः | ७८ |
| तस्माच्छ्रेयांसं पापीयान् | तै. सं. २. ५. १. २. | २ |
| तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं | भगवद्गीता १६. २४. | ६६ |
| तस्मात्प्रजननं परं | याज्ञिकी ७८ | २५४ |
| तस्मात्तेनोभयं पश्यति | छा. उ. १. २. ४. | १२१ |
| तस्मात्तेनोभयं संकल्पयन्ते | छा. उ. १. २. ६. | १२१ |
| तस्मात्स्त्रियो निरिन्द्रियाः | तैं. सं. ६. ५. ८. | १८० |
| तस्मादन्नं ददत् | याज्ञिकी. ६२. | २२३ |
| तस्माद्विनामा ब्राह्मणः | तै. सं. ६. ३. १. | १४९ |
| तस्मादुपारिष्टाद्दोषधयः | तैं. सं. ७. ५. १. | ३१५ |
| तस्माद्ब्राह्मणाय नाऽपगुरेत | तै. सं. २. ६. १० | १५४ |
| तस्मद्यज्ञवास्तु नाम्बवेत्यम् | तै. सं. ३. १. ९. | ११८ |
| तस्मिन् स्फेयेन प्रहरति | आप. श्रौ. २. २६. ५, बौ. श्रौ. १. ११. | ११४ |
| तस्मै हितम् | पा. सू. ५ १. ५. | ३५१ |
| तं यज्ञपात्रैर्दहन्ति | २५४ | |
| तं स खनति खानयति वा | बौ. आ. ४. २. (पृ. ११०. पं. ९.) | ११५ |
| तस्य वा एतस्य | तै. आ. २. १५. | १५१ |
| तस्य वाचकः प्रणवः | पात. सू. १. ३१. | २९२ |
| तस्याजिनमूर्ध्ववालं | गौ. ध. २३. १८. | १६५ |
| तस्याऽऽश्रमविकल्पमेके | गौ. ध. ३. १. | २५९ |
| तस्यैषा भवति यत्से शिश्नं | तै. आ. १. ७. | ४५ |
| तस्यैवं विदुषो यज्ञस्य | याज्ञिकी. ७९. | २६० |
| त्रीणि स्त्रियाः पातकानि | व. ध. २८. ७. | १७० |
| तृणं वा किंजारु वा | बौ. श्रौ. १. ४. (पृ. ७. पं. १०) | ११५ |
| तेभ्योऽभितप्तेभ्यः | छा. उ. २. २३. | ३०२ |
| तैलं दधि पयस्सोमः | ११२ | |
| त्रयो धर्मस्कन्धा | छा. उ. २. २३. | २१४ |
| त्यजेत् पितरम् | गौ. ध. २०. १. | १६६ |
| त्वामिद्धि हवामहे | साम. सं. पू. ३. १. | ३५९ |
| दक्षिणं बाहुं जान्वन्तरा | गौ. ध. १. ३८. | ५० |
| दक्षिणं बहुमुद्धरते | तै. आ. २. १. | ४० |
| दधिक्राव्णः | तै. सं. १. ५. ११. | २२४ |
| दधि भक्ष्यं तु शुक्तेषु | मनु. ५. १०. | ९८ |