बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ ब्रह्मचारिधर्माः |
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चक्रवन्तो रथशकटायः । इतरे प्रसिद्धाः । एषु गुरुणा तत्पत्नीभिर्वा सहा- सनं अदोषं दोषावहं न भवति । एषु सहासनाभ्युपगमादन्यत्र सदोषं सहास- नमिति गम्यते ॥ ३५ ॥
प्रसाधनोच्छादनस्नापनोच्छिष्टभोजनानीति गुरोः ॥ ३६ ॥
अनु०—गुरु के प्रसाधन, उच्छादन (छत्र धारण) तथा स्नान कराने का कार्य करे तथा उनके उच्छिष्ट अन्न का भोजन करे ॥ ३६ ॥
टि०—सूत्र में 'इति' शब्द से इसी प्रकार के अन्य गुरु-सेवापरक कार्यों का ग्रहण होता है—जैसे पीठ मलना, पैर दबाना आदि।
शिष्येण कार्याणीति शेषः । प्रसाधनं मण्डनम् । उच्छादनं छत्रधारणम् । स्नपनं गात्रमलापकर्षणम् । इतिकरणात् पादमर्दनपृष्ठधावनादयो गृह्यन्ते ॥३६॥
उच्छिष्टवर्जं तत्पुत्रेऽनूचाने वा ॥ ३७ ॥
अनु०—गुरु को पुत्र यदि अनूचान (वेद की एक शाखा का अङ्गों सहित अध्ययन कर चुका हो तो उसकी भी सेवा करे किन्तु उसके उच्छिष्ट अन्न का भोजन न करे ॥ ३७ ॥
उच्छिष्टभोजनवर्जं कार्यम् । अनूचाने चाऽगुरुपुत्रेऽपि । अनूचानः एक-शाखायास्साङ्गध्यायी । वाशब्दोऽवधारणार्थः, अनूचान एवेति ॥ ३७ ॥
प्रसाधनोच्छादनस्नापनोच्छिष्टवर्जं च तत्पत्न्याम् ॥ ३८ ॥
अनु०—प्रसाधन, उच्छादन, स्नपन तथा उच्छिष्ट भोजन को छोड़कर गुरु की पत्नी की भी सेवा करे ॥ ३८ ॥
टि०—यहाँ गुरु की युवती पत्नी का अभिप्राय है अर्थात् वृद्धों की वैसी सेवा भी करे।
युवत्यामिति शेषः । स्थविराया उच्छादनादिप्राप्त्यर्थोऽयमारम्भः ॥ ३८ ॥
¹धावन्तमनुधावेद्गच्छन्तमनुगच्छेत्तिष्ठन्तमनुतिष्ठेत् ॥ ३९ ॥
अनु०—गुरु के दौड़ने पर उनके पीछे दौड़े, उनके चलते रहने पर पीछे चले, उनके खड़े रहने पर उनके निकट खड़ा रहे ॥ ३९ ॥
ऋज्वेतत् ॥ ३९ ॥
नाप्सु श्लघमानस्स्नायात् ॥ ४० ॥
अनु०—जल में क्रीडा करते हुए स्नान न करे ॥ ४० ॥
१. Cf with आपस्तम्बधर्मसूत्र १. ६. ७-९.