बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २८ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ ब्रह्मचारिधर्मः |
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शुश्रूषाऽतिदिश्यते यावदध्ययनम् । यवीयसामित्युपरितनसूत्रात् प्रतिकर्षो द्रष्टव्यः ॥ ४५ ॥
'ऋत्विक्श्वशुरपितृव्यमातुलानां तु यवीयसां प्रत्युत्थायाऽभिभाषणम् ॥ ४६ ॥
**अनु०—**अपने से कम अवस्था वाले-ऋत्विक्, श्वशुर, चाचा, मामा के आगमन पर ( उनका चरण स्पर्श न कर ) आसन से उठकर स्वागतार्थ शब्दों का उच्चारण करे ॥ ४६ ॥
**टि०—**तुलना० आपस्तम्बधर्म० १.१४.१०
अयमपि नियमोऽध्यापकानामेवर्त्विगादीनाम् । अभिभाषणं स्वागतादिशब्दप्रयोगः ॥ ४६ ॥
प्रत्यभिवाद इति कात्यः ॥ ४७ ॥
**अनु०—**कात्य नाम के धर्मशास्त्री का मत है कि कम अवस्था वाले ऋत्विक् आदि को अभिवादन का उत्तर उसी प्रकार से देना चाहिए ॥ ४७ ॥
**टि०—**गोविन्द स्वामी के अनुसार ऋत्विक् आदि को अभिवादन करना चाहिए ।
कतस्य ऋषेरपत्यं कात्यः । स एवं मन्यते स्म-ऋत्विगादिभिः प्रत्यभिवादः कर्तव्य इति । एषां प्रत्यभिवादनविधानादितरैरभिवादनं कर्तव्यमिति गम्यते ॥ ४७ ॥
तत्र हेतुमाह—
२शिशावाङ्गिरसे दर्शनात् ॥ ४८ ॥
धर्मार्थौ यत्र न स्याताम् ॥ ३ ॥
**अनु०—**क्योंकि शिशु आङ्गिरस के उपाख्यान से स्पष्ट है ॥ ४८ ॥
**टिप्पणी—**शिशु आङ्गिरस की कथा मनुस्मृति २. १५१-१५३ में उल्लिखित है । शिशु आङ्गिरस ने अपने पिता को वेद का अध्यापन किया तथा उन्हें "पुत्रकाः" कहकर संबोधित किया ।
यह कथा ताण्ड्यमहाब्राह्मण १३.३.२४ में भी दी गयी है ।
१. Cf with आपस्तम्बधर्म. १. १४ १०
२. ब्राह्मस्य जन्मनः कर्ता स्वधर्मस्य च शासिता ।
बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ॥