भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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२८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ ब्रह्मचारिधर्मः

शुश्रूषाऽतिदिश्यते यावदध्ययनम् । यवीयसामित्युपरितनसूत्रात् प्रतिकर्षो द्रष्टव्यः ॥ ४५ ॥

'ऋत्विक्श्वशुरपितृव्यमातुलानां तु यवीयसां प्रत्युत्थायाऽभिभाषणम् ॥ ४६ ॥

**अनु०—**अपने से कम अवस्था वाले-ऋत्विक्, श्वशुर, चाचा, मामा के आगमन पर ( उनका चरण स्पर्श न कर ) आसन से उठकर स्वागतार्थ शब्दों का उच्चारण करे ॥ ४६ ॥

**टि०—**तुलना० आपस्तम्बधर्म० १.१४.१०

अयमपि नियमोऽध्यापकानामेवर्त्विगादीनाम् । अभिभाषणं स्वागतादिशब्दप्रयोगः ॥ ४६ ॥

प्रत्यभिवाद इति कात्यः ॥ ४७ ॥

**अनु०—**कात्य नाम के धर्मशास्त्री का मत है कि कम अवस्था वाले ऋत्विक् आदि को अभिवादन का उत्तर उसी प्रकार से देना चाहिए ॥ ४७ ॥

**टि०—**गोविन्द स्वामी के अनुसार ऋत्विक् आदि को अभिवादन करना चाहिए ।

कतस्य ऋषेरपत्यं कात्यः । स एवं मन्यते स्म-ऋत्विगादिभिः प्रत्यभिवादः कर्तव्य इति । एषां प्रत्यभिवादनविधानादितरैरभिवादनं कर्तव्यमिति गम्यते ॥ ४७ ॥

तत्र हेतुमाह—

२शिशावाङ्गिरसे दर्शनात् ॥ ४८ ॥
धर्मार्थौ यत्र न स्याताम् ॥ ३ ॥

**अनु०—**क्योंकि शिशु आङ्गिरस के उपाख्यान से स्पष्ट है ॥ ४८ ॥

**टिप्पणी—**शिशु आङ्गिरस की कथा मनुस्मृति २. १५१-१५३ में उल्लिखित है । शिशु आङ्गिरस ने अपने पिता को वेद का अध्यापन किया तथा उन्हें "पुत्रकाः" कहकर संबोधित किया ।

यह कथा ताण्ड्यमहाब्राह्मण १३.३.२४ में भी दी गयी है ।


१. Cf with आपस्तम्बधर्म. १. १४ १०
२. ब्राह्मस्य जन्मनः कर्ता स्वधर्मस्य च शासिता ।
बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ॥