भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 486 में से

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पृष्ठ 82

३० बौधायन-धर्मसूत्रम् [ ब्रह्मचारिधर्माः

अयोग्याध्यापने दोषमाह—
अग्निरिव कक्षं दहति ब्रह्मपृष्टमनादृतम् ।
तस्माद्वै शक्यं न ब्रूयात् ब्रह्म मानमकुर्वतामिति ॥ २ ॥
अनु०—जिज्ञासा करके प्राप्त वेद अनादृत होने पर अध्येता को उसी प्रकार भस्म कर देता है जिस प्रकार अग्नि घर को । अतएव वेदविद्या को उपदेश ऐसे शिष्यों को नहीं देना चाहिए जो यथासंभव उस विद्या का मान न करें ॥ २ ॥
'शक्यं मानमिति सम्बन्धः । वैशब्दः पादपूरणः । ब्रह्म विद्या मानं पूजा ॥ २ ॥
ब्रह्मचर्यविधावेवेतिहासमाह—
^२अत्रैवाऽस्मै वचो वेदयन्ते ॥ ३ ॥
अनु०—इसी विषय में ब्रह्मचारी को यह उपदेश दिया गया है ॥ ३ ॥
एवेत्येवमित्येतस्मिन्नर्थे । एवमस्य ब्रह्मचारिण इतिहासरूपं वचो वेदयन्ते वाजसनेयिनः । तच्च वक्ष्यमाणम् ॥ ३ ॥
^३ब्रह्म वै मृत्यवे प्रजाः प्रायच्छत् तस्मै ब्रह्मचारिणमेव न प्राय-
च्छत्सोऽब्रवीदस्तु मह्यमप्येतस्मिन् भाग इति यामेव रात्रिं समिधं
नाऽऽहराता इति ॥ ४ ॥
अनु०--ब्रह्म ने सृष्ट प्राणियों को मृत्यु को दे दिया, किन्तु केवल ब्रह्मचारी को नहीं दिया । मृत्यु ने कहा: 'मुझे भी इस ब्रह्मचारी में अंश मिलना चाहिए' ब्रह्म ने कहा—जिस रात्रि यह समिदाहरण न करे उसी रात्रि तुम्हें इसमें अंश मिलेगा अर्थात् तुम इसे नष्ट कर सकोगे ॥ ४ ॥
टि०—समिदाहरण से यहाँ अग्नीन्धन, वेदाध्ययन, गुरुशुश्रूषा आदि आवश्यक आचार नियमों का भी अर्थ ग्राह्य है । यह शतपथब्राह्मणे ११.२.६ से उद्धृत है ।
ब्रह्मशब्देन जगत्कारणरूपमुच्यते, वेदसम्बन्धात् । तत् मृत्यवे प्रजाः प्रददौ । किमर्थम् ? मारयितुम् । प्रयच्छदपि तस्म ब्रह्मचारिणमेव न प्रायच्छत् आत्मसन्निकर्षात् । अथ मृत्युराह—सोऽब्रवीदस्तु मह्यमप्येतस्मिन् भाग इति । ब्रह्मचारिण्यपि^४ मारणाय मम प्रवेशोऽस्त्वित्यर्थः । ततो ब्रह्माऽब्रवीत्सा रात्रि-


१. न ब्रूयादिति सम्बन्धः, इति ग. पु.
२. एवास्मै, इति क, पु, एते वास्मै, इति ङ पु,
३. गोपथब्राह्मणे ( १. २. ६. ) द्रष्टव्यम् ।
४. मरणणमंप्रवेशोऽस्तु इति, क, पु.