भारतकोश
बौधायन श्रौतसूत्रम् (कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय शाखा - सम्पूर्ण प्रश्न एवं श्रौत-याग कल्प सटीक)

बौधायन श्रौतसूत्रम् (कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय शाखा - सम्पूर्ण प्रश्न एवं श्रौत-याग कल्प सटीक)

Baudhayana Shrautasutra of Taittiriya Samhita with Commentary

आचार्य बौधायन (सम्पादक: डब्ल्यू. कालन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished774 पृष्ठ

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र्वर्द्धिञ्च ते शतपत्नं चाश्वो म उद्गास्यतीति ' ते ऽश्वस्य वालधिम् समन्वारभन्ते ऽग्निस्ते वाजिन्युङ्ङनु ल्बारभे स्वस्ति मा संपारय वायुस्ते वाजिन्युङ्ङनु ल्बारभे स्वस्ति मा संपारयादित्यस्ते वाजि- न्युङ्ङनु ल्बारभे स्वस्ति मा संपारयेत्य॑थोदञ्चो ऽभि¹ पवमानम् सर्पन्त्युत्तरत एष वडवाव्रज उच्चाव्य परिश्रितो भवति ' तं ५ विष्वञ्चन्त्य॑भ्यश्वं वडवाः क्रन्दन्त्य॑भ्यश्वो वडवाः क्रन्दति ' सो ऽश्वस्तोकीयस्तत्पुण्या वाचः संप्रवदन्ति ' ॥ १७ ॥ उदगाद्भो३दा अयमश्वो मेध्य आयुरुदगात्सुभूतमुदगासौ- द्ब्रह्मवर्चसमुदगासौदिदमुदगासौदिदमुदगासौदिति पुण्या वाचः संप्रवदन्तू॑त्सृजन्ति वडवा ' अश्वशालायामश्वं निग्रथ्नन्

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