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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

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108 साहिब बन्दगी

(47) धनुष बाण से साहिब जी को मरवाया जाना

लगातार साहिब को मारने में विफल हो रहे शेख तकी को दुखी देख उसके साथी मौलवी ने उसे एक तरकीब बताई कि क्यों न कबीर को धनुष बाण से मरवाया जाए। उसने शेख तकी को समझाया कि पहले समय में बाण चलाने वाला छिपकर भी बाण चलाता था और जिस पर चलाया जाता था, उसे मालम ही नहीं होता था। छिपकर बाण चलाने से कबीर कोई जादू भी नहीं कर सकेगा और उसका अंत हो जायेगा। शेख तकी को तरकीब बड़ी प्यारी लगी। उसने धनुष बाण चलाने में कुशल व्यक्ति को लाने की आज्ञा दी। जब उसके सैनिक ऐसे व्यक्ति को ले आए तो शेख तकी ने उसे उसका काम बता दिया। तकी ने साथ ही उसे कह दिया कि यदि तुम अपने काम में सफल हो गये तो मूँह मांगा ईनाम दिया जायेगा। बाण-चालक ने बात स्वीकार कर ली। शेख तकी ने कह दिया कि तुम मेरे इशारे का इंतज़ार करना। साहिब भरे दरबार में सत्य भक्ति का गुणगान करते हुये भक्तजनों को निहाल कर रहे थे तो तकी का इशारा पाकर धनुषधारी ने छिपकर साहिब पर तीर चलाने शुरू कर दिये। वो बाण तो चलाता था, पर उसके बाण साहिब के चरणों को स्पर्श करके फिर उसके तरकश में वापिस लौट आते थे। धनुषधारी ने बड़े बाण चलाए, पर जब साहिब का कुछ न बिगाड़ सका तो यह कौतक देखकर धनुषधारी उल्टे पाँव भाग खड़ा हुआ। शेख तकी की निराशा का कोई अंत न रहा। वह घबरा कर इधर-उधर देखने लगा और साहिब की जय-जयकार होने लगी।

छिपकर बाण चलाओ साहिब पर, वो जादू न कर पाये। लगे दरबार में धनुषधारी ने, कई बाण चलाये॥ तीर चरणों का पा स्पर्श, मुड़ तरकश में आये। घबराकर चालक हुआ व्याकुल, भागा जान बचाये॥