बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)
Bawan Kasni
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)
पृष्ठ 17, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ेंबावन कसनी ( कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई ) 15
तेरहें नानक से कह्यो उपदेशा। गुप्त भेद का कहा संदेशा॥
चौदहें साहु दमोदर समझावा। करामात दै जीव मुक्तावा॥
चौदह हंस कलयुग में कीन्हा। गुरु स्वरूप परवाना दीन्हा॥
पाँच लाख हम पहिले तारे। पीछे धर्मनि तुम पगुधारे॥
वंशन थाप्यों कियो कडिहारा। लाख ब्यालिस जीव उबारा॥
साहिब ने धर्मदास को कहा कि हर युग में आता हूँ और जीवों को चिताकर अमर लोक ले जाता हूँ। इस तीन लोक में काल जीवों को सता रहा है। यह देख साहिब ने मुझे भेजा।
वो कह रहे हैं कि मेरा कोई माता-पिता नहीं है, मैं अविगत से चला आया हूँ। जो मेरे नाम को पकड़ लेता है, वो काल से मुक्त हो जाता है।
कबीर साहिब खुद साहिब थे। हम उनकी वाणी को लेकर चल रहे हैं। अन्य कोई भी उनकी वाणी को पूर्ण रूप से लेने से हिचकेगा। इसके कई कारण हैं। हालांकि हमारा पंथ कबीर-पंथ नहीं है, क्योंकि साहिब ने कभी नहीं कहा कि मुझे मानना, उन्होंने सतगुरु की भक्ति करने को कहा, सतगुरु को ऊँचा स्थान दिया। पर मैं उनकी वाणी को एक सहारे के रूप में ले रहा हूँ। वो भी लेने की ज़रूरत नहीं है, पर इससे मेरी बात को गवाही मिल जाती है। बाकी महात्मा वाणी को पूर्ण रूप में लेने से इसलिए हिचक रहे हैं, क्योंकि साहिब जी पाखण्ड के ख़िलाफ़ थे और पाखण्ड के हरेक रूप पर उन्होंने चोट की है। ऐसे में बाकिओं को अपनी पोल खुलने का भय है। वे तो बस उतना ही ले रहे हैं, जितने से उनका स्वार्थ सिद्ध हो सके। उनकी वाणी को लेकर कहीं वो तीन लोक को स्थापित कर रहे हैं, कहीं उनकी वाणी को लेकर सगुण-भक्ति को स्थापित कर रहे हैं। बस इनका हाल तो उस भिखारी की तरह है जो दान माँगने के लिए उनका नाम लेकर अक्सर गाता फिरता है-
दान दिये धन न घटे, नदी न घटे नीर।
अपनी आँखों देख ले, यों कथि कहहिं कबीर॥
पर वह कभी भी यह दोहा क्यों बोलेगा-
माँग़ण मरण समान है, मत माँगो कोई भीख।
माँग़ण ते मरना भला, यह सतगुरु की सीख॥
वो तो बस साहिब के नाम की मोहर लगाकर अपना मतलब निकाल रहा है, लोगों को बुद्धू बना रहा है। वो तो साहिब ने दूसरे अर्थ से कहा है। यानी दान देने वाले की इच्छा पर है, माँगने के लिए तो कहा ही नहीं। ऐसे ही सगुण भक्ति के बारे में समझाया, पर यह तो कहा ही नहीं कि सगुण-भक्ति से कल्याण होगा। उन्होंने तो आत्मा के कल्याण के लिए सगुण और निर्गुण दोनों से परे परा-भक्ति का रहस्य दिया।