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बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)

Bawan Kasni

सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)

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18 साहिब बन्दगी

#(2) साहिब जी को जंजीरों से बाँधकर गंगा में डुबोया गया

धर्म गुरु ने बादशाह सिकंदर व भक्तजनों की साहिब के प्रति श्रद्धा से दुखी होकर फैसला किया कि वो कबीर का अंत कर देगा। उसके मन में ईर्ष्या की आग पैदा हो रही थी। उसने मौलवियों और काज़ियों द्वारा साहिब पर समाज द्रोही होने का मुकद्दमा करवा दिया और स्वयं धर्मगुरु और राजा का प्रधानमंत्री होने के कारण खुद मुकद्दमा सुना। शेख तकी ने फैसला सुनाया कि कबीर समाजद्रोही है, धर्म के ख़िलाफ़ बात करता है, इसलिए उसे सजाए मौत दी जाए। राजा ने तकी को बहुत समझाया कि कबीर साहिब पर जुल्म मत कर; वो सच्चा फ़कीर है। राजा ने कहा कि तुमने मुझे खुद कहा था कि पीर और फ़कीर अल्लाह के रूप हैं। फिर आज तुम खुद कबीर को मारना चाहते हो।

कहे सिकंदर सुनो मेरे पीर, मृत्यु दण्ड मत देह।
कबीर अल्लाह का नूर है मेरी बात मान लेह॥
हाथ-पाँव, गले बाँध जंजीर, गंगा बीच डुबाया।
राजा परजा सब ही देखें कोई रोक न पाया॥

पीर शेख तकी ने राजा से कहा कि तुम मेरी बात मान लो, नहीं तो मैं तुम्हें शाप दे दूँगा। उसने अपना मुक्ट पृथ्वी पर पटक दिया। राजा डर गया। साहिब ने राजा से कह दिया कि शेख तकी जो करना चाहता है, उसे करने दो। आप मत रोको। बादशाह सिकंदर ने साहिब को मारने की आज्ञा नहीं दी, पर तकी से कह दिया कि आप जो करना चाहे, वो करो। शेख तकी ने सिपाहियों को आज्ञा दी कि कबीर को गंगा नदी के किनारे ले चलो। सिपाही साहिब को पकड़कर वहाँ ले गये। तब शेख तकी ने आज्ञा दी कि नाव पर कबीर को बिठाकर गंगा के बीच ले चलो और वहाँ डूबने के लिए छोड़ दो। चारों ओर पाखण्डियों का शोर मचा हुआ था कि देखो कबीर को जंजीरों से बाँधकर गंगा जी में छोड़ रहे हैं। पर साहिब तो शांत भाव से मुस्करा रहे थे। सैनिक साहिब को गंगा के बीच में डुबोकर चले गए। यह दृश्य पूरी जनता देख रही थी। राजा भी वहाँ पर मौजूद था। यह कौतक देख सब हैरान हो गए कि साहिब गंगा की लहरों में मृगशाला पर बैठे मुस्करा रहे थे। उनके सभी बंधन टूट चुके थे। जंजीरें पुष्पमालाएँ बनकर साहिब के गले में पड़ी दिख रही थीं। भक्त जन यह कौतक देख प्रसन्न होकर साहिब की जय-जयकार करने लगे और पाखण्डियों के चेहरे शर्म से झुक गये।

लहर गंगा की टूटे बंदन, बैठे मृगछाला पै कबीर।
मूर्ख दुनिया समझे जुलाहा, साहिब आया पीरों का पीर॥

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