बावन कसनी (कबीर साहिब को 52 बार सजाए मौत दी गई)
Bawan Kasni
सद्गुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sant Ashram Ranjari 2015 Edition · Sant Ashram Ranjari, Samba (J&K)
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समाज उन्हें महान् समाज सुधारक के रूप में, कार्ल मार्क्स से पहले का समाज सुधारक मानते हैं। कवि लोग उनकी सरल शैली एवं रचनाओं को देखकर उन्हें कवि सम्राट मानते हैं। तर्कवादी उन्हें परम स्पष्ट वक्ता के रूप में मानते हैं। ब्रह्मज्ञानी उनकी ज्ञान शैली का अध्ययन करने पर उन्हें ब्रह्मवेता के रूप में मानते हैं। सन्तों में उनका स्थान सन्त सम्राट या प्रथम सन्त सद्गुरु के रूप में मानते हैं। योगी लोग उनके परा रहस्यों एवं साधना के आन्तरिक आयामों का मनन करने पर उन्हें परम योगेश्वर मानते हैं। व्यंगकार उन्हें महान् व्यंगकार मानते हैं। भक्त लोग कबीर साहिब की भक्ति रस की रचनाओं को पढ़कर उन्हें परम भक्त मानते हैं। न्याय कर्ता उनके तर्कों का अध्ययन करके उन्हें महान् न्यायवेता मानते हैं। रहस्यवादी उन्हें अध्यात्म जगत का महान रहस्यवादी मानते हैं। ज्ञानियों में उनका स्थान वैसा है जैसे सरिताओं में गंगा। उन्होंने किसी धर्म की स्थापना नहीं की, उनका एक लक्ष्य था, केवल मानव को जगाना। मानवता को जगाने के साथ उन्होंने सर्वशक्तिमान की भक्ति का संदेश दिया। कुछ लोग उन्हें खण्डनवादी मानते हैं परन्तु उन्होंने हर भक्ति का महात्म बताया, साथ में यह भी बताया कि किस भक्ति से किस तत्व की प्राप्ति होती है चार तरह की मुक्तियों के स्थान (सामिप्य मुक्ति, सालोक्य, सारोप्य तथा सायुज्य मुक्ति) का वर्णन किया, इनको चार किस्म के स्वर्ग भी कहा, उनकी प्राप्ति के सूत्र बताए जो वेदों से मिलते हैं। परमनिर्वाण के विषय में बताया जहाँ जाकर आत्मा स्थाई अमरत्व को प्राप्त होती है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को पिंड में बताया, उनके साधना के सूत्र सर्वमान्य हुए, उनकी शैली को सबने स्वीकार किया।
भक्ति को कबीर साहिब जी ने तीन भागों में बाँटा
सगुण भक्ति निर्गुण भक्ति परा भक्ति ( वर्णनात्मक शब्द ) ( धुनात्मक शब्द ) ( मूकात्मिक शब्द )
सुन्न गगन में सबद उठत है, सो सब बोल में आवै। निःसबदी वह बोलै नाहीं सो सत सबद कहावै।। —पलटू साहिब जी सगुण भक्ति करे संसारा। निर्गुण योगेश्वर अनुसारा। इन दोनों के पार बताया। मेरो चित्त एको नहीं आया।।
आपने सगुण और निर्गुण इन दोनों के पार बताया। दादू दयाल जी ने कहा- कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय। अटपट चाल कबीर की, मौसे कही न जाय।। जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, उसको काल न खाय।।