भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 151 में से

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सत्रहवां बेताल

उन्मादिनी की कथा

राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर शिंशपा-वृक्ष से बेताल को उतारा। उसे कंधे पर डाला और मौन भाव से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। कुछ आगे पहुंचने पर बेताल ने फिर मौन भंग किया और राजा को पुनः अपनी शर्त दोहराकर उसे यह कथा सुनाई।

बहुत पहले गंगा किनारे कनकपुर नाम का एक नगर था। वहां के राजा का नाम था—यशोधन। वह सचमुच अपने नाम को सार्थक करने वाला राजा था। वह परम प्रतापी था और प्रजा उसके राज्य में हर प्रकार से सुखी थी।

उस राजा के नगर में एक श्रेष्ठि (सेठ) रहता था, जिसकी कन्या उन्मादिनी एक परम सुन्दरी थी। जो भी उसकी ओर देखता, वह उसकी मोहिनी-शक्ति से उन्मत्त हो जाता था। उसका सौन्दर्य कामदेव को भी विचलित करने वाला था। जब सेठ की कन्या युवती हुई, उसके पिता ने राजा यशोधन के पास जाकर निवेदन किया—‘‘प्रभो ! मैं अपनी रत्न स्वरूप कन्या का विवाह करना चाहता हूं किंतु आपसे निवेदन किए बिना उसका विवाह करने का मुझे साहस नहीं होता। सभी रत्नों के स्वामी आप ही हैं अतः या तो मेरी कन्या को पत्नी रूप में स्वीकार करके आप मुझे कृतार्थ करें या अस्वीकार कर दें। ’’

वणिक की यह बात सुनकर राजा ने उस कन्या के शुभ लक्षणों को देखने के लिए आदरपूर्वक अपने ब्राह्मणों को भेजा। उन ब्राह्मणों ने वहां जाकर ज्योंही उस परम सुंदरी को देखा त्योंही उनका चित चंचल हो गया; किंतु शीघ्र ही धैर्य धारण करके उन लोगों ने सोचा—‘यदि राजा इस कन्या से विवाह करेगा तो उसका राज्य अवश्य ही नष्ट हो जाएगा क्योंकि राजा तब इसी के रूप में रमा रहेगा। वह प्रजा के हितों की देखभाल नहीं कर पाएगा। अतः हम लोगों को राजा को यह नहीं बताना चाहिए कि यह कन्या सुलक्षण है।’ यही सोचकर वे सब राजा के पास पहुंचे और उन्होंने राजा से कहा—‘‘देव, वह कन्या तो कुलटा है। हमारा परामर्श है कि आप उसके साथ विवाह न करें।’’

यह जानकर राजा ने उस सुन्दरी से विवाह करना अस्वीकार कर दिया। तब उस वणिक ने राजा की आज्ञा से अपनी कन्या का विवाह बलधर नाम के राजा के सेनापति से कर दिया। उन्मादिनी नाम से विख्यात वह सुन्दरी सुखपूर्वक अपने पति के पास रहने लगी किंतु उसके मन में एक फांस-सी बनी रही कि राजा ने कुलटा कहकर मेरा त्याग किया है।

एक बार बसन्त ऋतु में राजा यशोधन हाथी पर चढ़कर बसन्त महोत्सव देखने को निकला। राजा के आगमन की घोषणा सुनकर उन्मादिनी ने जो अपने को


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