बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 151 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह सुनकर अतिथि का आदर करने वाला वह सिद्ध व्रतधारी अपनी मटी (छोटी कुटिया) में घुस गया। वहां उसने इष्ट सिद्धि देने वाली अपनी विद्या का स्मरण किया। याद करते ही विद्या प्रकट हुई और जब उसने पूछा कि—‘‘मैं क्या करूं ?’’ तो उस तपस्वी ने आज्ञा दी कि—‘‘मेरे इस अतिथि का आतिथ्य-सत्कार करो।’’
विद्या ने कहा—‘‘ऐसा ही होगा।’’ कहकर उसने एक स्वर्ण नगर उत्पन्न कर दिया, जिसमें बगीचा भी था और सुन्दर-सुन्दर स्त्रियां भी थीं।
उस नगर से निकलकर सुन्दरियां विस्मित चंद्रस्वामी के पास आई और बोली—‘‘भद्र उठो, स्नान-भोजन करो और अपनी थकावट दूर करो।’’
यह कहकर वे उसे अंदर ले गई। स्नान कराकर उन्होंने उसके शरीर पर अंगराग लगाया। उनके द्वारा दिए गए उत्तम वस्त्र पहनने के बाद वे उसे एक दूसरे सुन्दर भवन में ले गई।
उस भवन के अंदर उसने एक सर्वांग सुन्दर युवती को देखा, जो उन सबकी प्रधान जान पड़ती थी और जिसे मानो विधाता ने बड़ी कुशलता से अपने हाथो स्वयं गढ़ा था। उसने उत्कंठापूर्वक चंद्रस्वामी को अपने आसन के आधे हिस्से पर बैठाया। फिर उसके साथ ही उसने दिव्य भोजन किया। भोजन के उपरान्त चंद्रस्वामी ने स्वादिष्ट पके हुए फल और फिर ताम्बूल (पान) खाया। फिर उसके साथ नरम बिस्तर पर सोकर चरम सुख प्राप्त किया !
सवेरे जब चंद्रस्वामी जागा तो वहां केवल उसे शिवालय ही दिखाई दिया। वहां न तो वह दिव्य स्त्री थी, न नगर था और न वे दासियां ही थीं।
तभी मठी के भीतर से हंसता हुआ वह तपस्वी निकला। उसके यह पूछने पर कि—‘‘रात कैसी कटी ?’’ उदास चित्त वाले चंद्रस्वामी ने उससे कहा—‘‘भगवन, आपकी कृपा से रात तो मैंने बहुत सुखपूर्वक बिताई लेकिन अब उस दिव्य स्त्री के बिना, मेरे प्राण निकले जा रहे हैं।’’ यह सुनकर उस दयालु तपस्वी ने मुस्कराते हुए चंद्रस्वामी से कहा—‘‘तुम यहीं ठहरो वत्स। रात को तुम्हें फिर वही सुख प्राप्त होगा।’’ तपस्वी के कहने पर चंद्रस्वामी वहीं ठहरकर तपस्वी की विद्या के प्रताप से वह हर रात सुख भोगने लगा।
धीरे-धीरे इस विद्या का प्रभाव जानकर देव प्रेरणा से एक दिन चंद्रस्वामी ने उस तपस्वी को प्रसन्न करके कहा—‘‘भगवन ! मुझ शरणागत पर यदि सचमुच आपकी कृपा है तो मुझे यह विद्या सिखा दीजिए, जिसका ऐसा प्रभाव है।’’
चंद्रस्वामी द्वारा आग्रहपूर्वक ऐसा कहने पर तपस्वी उससे बोला—‘‘वत्स यह विद्या तुम्हारे लिए असाध्य है क्योंकि इसकी साधना जल के अंदर की जाती है। जो साधक वहां इसकी साधना करता है, उसको भरमाने के लिए कई मायाजाल उत्पन्न होते है जिसके कारण वह सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता। वहां उसे ऐसा भ्रम होता है कि उसका फिर से जन्म हुआ है। तब वह अपने को बालक, फिर युवक, फिर विवाहित मानता है
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