भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

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घोड़े को पानी पिलाया और खुला छोड़ दिया ताकि वहा उगी हरी-भरी दूब खाकर वह अपना पेट भर सके। फिर स्वयं स्नान करके जल पिया। थकावट दूर होने पर वह उस रमणीक स्थान में इधर-उधर नजर डालने लगा।

तभी उसकी निगाह एक अशोक-वृक्ष के नीचे अपनी सखी के साथ बैठी एक मुनि-कन्या पर पड़ी। वह फूलों के गहने एवं वल्कल वस्त्र पहने हुए थी। प्राकृतिक श्रृंगार करने से वह बहुत मनोरम प्रतीत हो रही थी। राजा उसके रूप को देखकर मोहित हो गया। उसने मन में सोचा—'अरे कौन है यह ? क्या यह कोई दूसरी सावित्री है जो सरोवर में स्नान करने आई हुई है या शिव की गोद में छूटी पार्वती है जो फिर भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या करने आई है ? अथवा यह दिन में अस्त हुए चंद्रमा की कान्ति है, जिसने व्रत धारण कर रखा है। तो मैं धीरे-धीरे इसके पास जाकर वरदान प्राप्त करूं।'

ऐसा सोचकर वह राजा उस कन्या के पास पहुंचा। उस कन्या ने भी जब राजा को अपने निकट आते देखा तो उसकी आंखों में चमक आ गई। फूलों की माला गूंथते उसके हाथ सहसा ही रुक गए। वह सोचने लगी—'ऐसे विकट वन में आने वाला यह पुरुष कौन है ? कोई विद्याधर है या कोई सिद्ध ? इसका रूप तो मेरी आंखों को चकाचौंध किए दे रहा है।'

मन-ही-मन ऐसा सोचकर लज्जा के कारण तिरछी नजरों से देखती हुई, वह उठ खड़ी हुई। यद्यपि उसके पांव जकड़-से गए थे तथापि वह जाने को उद्यत हुई। तब चतुर और विनम्र राजा उसके पास पहुंचा और बोला—"सुन्दरी ! जो व्यक्ति दूर से आया है, जिसे तुमने पहली बार देखा है और जो तुम्हारा दर्शन मात्र चाहता है, उसके स्वागत-सत्कार का तुम आश्रम वासियों का यह कैसा ढंग है कि तुम उससे दूर भागी जा रही हो ?"

राजा के ऐसा कहने पर उस कन्या की सखी ने, जो राजा के समान ही चतुर थी, राजा को वहां बिठाया और उसका आतिथ्य-सत्कार किया। उत्सुक राजा ने विनम्र स्वर में पूछा—"भद्रे ! तुम्हारी इस सखी ने किस पुण्यवान वंश को अलंकृत किया है ? इसके नाम के वे कौन से अक्षर हैं, जो कानों में अमृत उड़ेलते हैं ? और इस निर्जन वन में, पुष्प के समान कोमल अपने शरीर को तपस्वियों जैसी चर्या से क्यों कष्ट दे रही हैं ?"

राजा की यह बातें सुनकर उसकी सखी ने उत्तर दिया—"श्रीमंत ! यह महर्षि कण्व की पुत्री इंदीवर प्रभा है। यह आश्रम में ही पाली-पोसी गई है। इसकी माता स्वर्ग की अप्सरा मेनका है। पिता की आज्ञा से यह इस सरोवर पर स्नान करने के लिए आई है। इसके पिता का आश्रम यहां से अधिक दूर नहीं है।"

राजा यह बातें सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और घोड़े पर सवार होकर उस कन्या का हाथ मांगने के लिए कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंचा।

वहा पहुंचकर राजा ने मुनि के चरणों की वंदना की। मुनि ने भी उसका

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