भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 151 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

पत्नी को याद करता हुआ वह भी बगीचे में जा पहुंचा। वहां उसने अपनी स्त्री को पर-पुरुष के निकट मरी हुई देखा। फिर भी उस पर अत्यंत अनुराग होने के कारण हृदय मे शोक की अग्नि जल उठी और उसने भी वहीं पर अपने प्राण त्याग दिए।

तत्पश्चात्, वहां इकट्ठे हुए लोगों की चीख-पुकार सुनकर नगर के सभी लोगों को सारा वृत्तांत मालूम हो गया और वे विस्मित होते हुए वहां आ पहुंचे। अनंगमंजरी के पिता ने चामुंडा देवी का जो मंदिर बनवाया था, वह निकट ही था। यह दृश्य देखकर गणों ने देवी से निवेदन किया—'‘हे देवी ! अर्थदत्त ने ही यहां आपकी प्रतिष्ठा की है। यह व्यापारी सदा से ही आपका भक्त रहा है। अतः इस दुख के समय इस पर दया करें।’'

गणों की प्रार्थना सुनकर देवी ने उन्हें पुनर्जीवित होने का आशीर्वाद प्रदान कर दिया। देवी की कृपा से वे तीनों ही इस प्रकार जीवित हो उठे मानो सोते से जाग पड़े हों। अब उनके काम-विकार भी नष्ट हो चुके थे।

यह आश्चर्यजनक घटना देखकर वहां उपस्थित सभी लोग बहुत आनंदित हुए। कमलाकर लज्जा से मस्तक झुकाकर अपने घर चला गया। अर्थदत्त भी लजाई हुई अपनी कन्या को उसके पति सहित घर ले गया।

उस रात को मार्ग में जाते हुए बेताल ने यह कथा सुनाकर पृथ्वीपति विक्रमादित्य से पुनः पूछा— “राजन, अब तुम मेरी इस शंका का समाधान करो कि प्रेम में अंधे बने हुए उन तीनों में से किसकी आसक्ति अधिक थी ? अनंगमंजरी को कमलाकर की अथवा अनंगमंजरी के पति मणिवर्मा की ? यदि जानते हुए भी तुमने मेरी शंका का समाधान नहीं किया तो मेरा वही शाप तुम पर फट पड़ेगा।”

बेताल की यह बातें सुनकर राजा ने उत्तर दिया—‘‘हे बेताल ! मुझे तो इन तीनों में से मणिवर्मा ही अधिक मोहान्ध जान पड़ता है। कारण यह कि शेष दोनों तो एक-दूसरे के प्रति अनुरक्त थे और समय पाकर उनकी आसक्ति पक्की हो चुकी थी, अतः उन दोनों ने प्राण त्याग दिए, तो ठीक ही था; लेकिन मणिवर्मा तो बहुत ही मोहान्ध था। उसको तो पर-पुरुष के प्रति आसक्त अपनी पत्नी पर क्रोध करना चाहिए था। लेकिन ऐसा न करके उसकी प्रीति के कारण शोक से उसने अपने प्राण ही त्याग दिए थे, अतः सबसे ज्यादा मोहान्ध वही हुआ। उसी की आसक्ति सबसे अधिक थी।‘’

राजा का उत्तर बिल्कुल सटीक था, अतः बेताल संतुष्ट हो गया और पहले की ही भांति अपनी माया से राजा के कंधे से उतरकर अन्तर्ध्यान हो गया। तत्पश्चात् फिर वह उसी शिंशपा-वृक्ष पर जाकर उलटा लटक गया। दृढ़ निश्चयी राजा विक्रमादित्य भी पुनः उसे लाने के लिए उस शिंशपा-वृक्ष की ओर दौड़ चला।

$\square\ \square\ \square$

136 ▢ बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी · पृष्ठ 135, कुल 151 में से · BharatKosha