बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृक्ष पर मृत अवस्था में लटकता हुआ देखा। हुआ यूं था कि जब वह युवक चोरी-छिपे उद्यान में प्रवेश कर रहा था तो नगर रक्षकों ने उसे कोई चोर समझा और उसे पीट-पीटकर मार डाला। फिर उसी उद्यान में उसके गले में फांसी का फंदा डालकर उसे वृक्ष से लटका दिया। अपने प्रेमी को इस अवस्था में देखकर वासुदत्ता स्तब्ध रह गई। वह विह्वल और उद्भ्रांत होकर चीख पड़ी—‘‘हाय मैं मारी गई।’’ तदोपरांत वह भूमि पर गिरकर करुण स्वर में विलाप करने लगी। जब वह कुछ चैतन्य हुई तो उसने अपने प्रेमी को वृक्ष से उतारकर भूमि पर रखा और उसे फूलों से सजाया।
प्रीति और शोक से उसका हृदय विवेकशून्य हो गया था। उसने उस निष्प्राण शरीर का आलिंगन किया और उसका मुख ऊपर उठाकर, वह ज्योंही उसका चुंबन करने चली, त्योंही उसके प्रेमी ने, जिसके शरीर में बेताल प्रविष्ट हो गया था, अचानक अपने दांतों से उसकी नाक काट ली।
पीड़ा से तिलमिलाकर वासुदत्ता तुरंत उससे दूर हट गई। लेकिन इस विचार से कि ‘कहीं वह जीवित तो नहीं है?’ वह अभागिनी फिर से आकर उसे देखने लगी। जब उसने देखा कि उसके शरीर से बेताल चला गया है और वह निश्चेष्ट तथा मृत है, तब वह डर गई और हारी-सी, रोती हुई, धीरे-धीरे महल की ओर लौट पड़ी।
उस चोर ने छिपकर यह सारी बातें देखीं। उसने सोचा—‘इस पापिनी ने यह क्या किया? अरे, स्त्रियों का हृदय तो बहुत भयानक, घने अंधेरे से भरा, अंधे कुएं के समान और बड़ा गहरा होता है। चलूं, देखूं अब यह क्या करती है।’ ऐसा सोचकर कौतूहल के कारण वह दूर से ही फिर उसका पीछा करने लगा।
वणिकपुत्री अपनी उस कोठरी में पहुंची, जहां उसका पति सोया पड़ा था। तब वह जोर-जोर से रोती हुई चिल्लाने लगी—‘‘बचाओ...बचाओ। पति के रूप में इस दुष्ट ने मेरी नाक काट ली है।’’
इस तरह बार-बार उसका रोना-चिल्लाना सुनकर उसके कुटुंबीजन और माता-पिता सभी घबराए हुए जागकर उनके शयनकक्ष में पहुंचे। वहां पहुंचकर जब उसके पिता ने देखा कि वासुदत्ता की नाक कटी हुई है और उसकी नाक से रक्त बह रहा है, तब उसके पिता ने क्रोध में आकर अपने जमाता को भार्याद्रोही जानकर रस्सी से बांध दिया।
वासुदत्ता की बातें सुनकर उसका पिता तथा अन्य सभी लोग समुद्रदत्त के प्रतिकूल हो गए थे। अतः बांधे जाने पर भी उसने गूंगे की तरह कुछ न कहा। इसी हो-हल्ले में धीरे-धीरे रात बीत गई। तब, सब कुछ जानता हुआ भी वह चोर, चुपके से वहां से चला गया।
समुद्रदत्त का श्वसुर वह बनिया, उसे तथा कटी नाक वाली अपनी बेटी को लेकर राजा के दरबार में पहुंचा। सारा वृत्तांत सुनने के बाद राजा ने समुद्रदत्त को दोषी मानते हुए उसे प्राणदंड की आज्ञा दे दी। अनंतर, जब बांधकर उसे वधस्थल की ओर ले जाया जा रहा था, तब वह चोर राजा के आदमियों के पास आकर बोला—‘‘हे अधिकारियों,
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