भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

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यह सुनकर वीरवर ने उससे कहा—‘‘हे देवी ! क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे जगत के रक्षक उस राजा की मृत्यु को रोका जा सके ?’’

‘‘हां, है।’’ स्त्री के रूप में धरती बोली—‘‘और वह उपाय केवल तुम ही कर सकते हो, वीरवर।’’

‘‘तो देवी, मुझे वह उपाय शीघ्रता से बतलाइए, जिससे मैं उसे कर सकूं। नहीं तो मेरे जीवन का कुछ भी अर्थ नहीं रह जाएगा। ’’

यह सुनकर पृथ्वी ने कहा—‘‘वत्स ! तुम्हारे समान वीर और स्वामिभक्त दूसरा कौन है ? अतः तुम राजा के कल्याण का उपाय सुनो। यहां से कुछ दूर देवी चंडिका का एक मंदिर है। यदि तुम अपने पुत्र की बलि देवी चंडिका को दे दो, तो राजा की मृत्यु नहीं होगी, वह सौ वर्ष तक और जी सकेंगे। यदि तुम आज ही यह काम कर सको तो ठीक है अन्यथा आज से तीसरे दिन राजा की मृत्यु अवश्यम्भावी है।’’

इस पर कर्तव्यनिष्ठ वीरवर ने कहा—‘‘देवी, अपने स्वामी का जीवन बचाने के लिए मैं कुछ भी करने को सदैव ही तत्पर हूं। मैं आज ही जाकर यह कार्य करता हूं।’’

‘‘तुम्हारा कल्याण हो वत्स।’’ तब ऐसा कहकर पृथ्वी अन्तर्ध्यान हो गई।

छिपकर पास ही खड़े राजा ने उन दोनों का वार्तालाप सुना और वह ‘वीरवर आगे क्या करता है’ इसकी प्रतीक्षा करने लगा।

घर पहुंचकर वीरवर ने अपनी पत्नी धर्मवती को जगाया और राजा के लिए पुत्र की बलि देने के लिए धरती ने जो कुछ कहा था, वह उसे कह सुनाया। सुनकर उसकी पत्नी ने कहा—‘‘नाथ, स्वामी का जीवन अवश्य बचाना चाहिए। आप इसी समय अपने पुत्र को बुलाकर उससे सारा वृत्तांत कहें।’’

तब वीरवर ने अपने बालक सत्यवर को जगाकर सारा वृत्तांत उसे बताया और कहा—‘‘बेटा, चंडिका देवी को तुम्हारी बलि दिए जाने पर ही हमारे स्वामी बच पाएंगे, नहीं तो आज से तीसरे दिन उनकी मृत्यु हो जाएगी।’’

यह सुनते ही उस बालक ने अपने नाम को सार्थक करते हुए निर्भीक होकर कहा—‘‘पिताजी, यदि मेरे प्राणों के बदले हमारे स्वामी का जीवन बचता है तो मैं इस कार्य को सहर्ष करने को तैयार हूं। मैने जो उनका अन्न खाया है, मैं उससे उऋण हो जाऊंगा। आप तुरंत मेरी बलि का प्रबंध कीजिए, जिससे मुझे शांति मिल सके।’’

सत्यवर के ऐसा कहने पर वीरवर ने कहा—‘‘बेटा, तुम धन्य हो। तुम सचमुच ही मेरे पुत्र हो। मुझे तुम पर बहुत गर्व है।’’

वीरवर के पीछे-पीछे आए हुए राजा ने ये सारी बातें सुनी। उसने सोचा—'अरे, ये तो सभी एक ही जैसे वीर है।'

अनंतर, वीरवर ने अपने बेटे सत्यवर को कंधे पर उठा लिया। उसकी पत्नी

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