बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 151 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब हरिस्वामी के कहने पर वह वीर पुरुष आगे बढ़कर उस राक्षस से लड़ने लगा। तरह-तरह के अस्त्रों से लड़ने वाले उन दोनों, मनुष्य और राक्षस, का युद्ध बड़ा आश्चर्यजनक हुआ। अपनी भार्या के लिए जिस तरह राम-रावण से लड़े थे, वैसे ही ये दोनों भी लड़ने लगे। कुछ ही देर में उस वीर ने एक अर्द्धचंद्राकार बाण से युद्ध में मतवाले उस राक्षस का मस्तक काट गिराया। राक्षस के मारे जाने पर वे सभी अलौकिक विद्याएं जानने वाले ब्राह्मण के रथ से वापस लौट पड़े।
हरिस्वामी के घर पहुंचकर, विवाह का समय आने पर उस ज्ञानी, वीर एवं अलौकिक विद्याएं जानने वाले के बीच झगड़ा पैदा हो गया। ज्ञानी ने कहा—‘‘यदि मैं न जानता कि सोमप्रभा कहां छिपाकर रखी गई है तो उसका पता कैसे चल पाता ? इसलिए उसका विवाह मेरे साथ ही होना चाहिए। ’’
इस पर अलौकिक विद्याओं के ज्ञाता ने कहा—‘‘यदि मैं आकाशगामी रथ न बनाता तो पल-भर में वहां आना-जाना कैसे हो पाता ? रथ पर बैठे राक्षस के साथ, बिना रथ के युद्ध भी कैसे संभव होता ? इसलिए यह कन्या मुझे ही मिलनी चाहिए। यह विवाह मैंने जीता है। ’’
तब उस वीर ने भी अपना पक्ष उनके सामने रखा। वह बोला—‘‘यदि मैने अपनी शक्ति से उस राक्षस का संहार न किया होता तो आप लोगों के प्रयल करने पर भी इस कन्या को कैसे वापस लाया जा सकता था ? इसलिए इन कन्या पर तो मेरा ही अधिकार बनता है। यह कन्या मुझे ही मिलनी चाहिए।’’ इस प्रकार उन तीनों का झगड़ा सुनकर हरिस्वामी का मन उद्भ्रांत हो गया और वह अपना सिर पकड़कर बैठ गया।
इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से पूछा—‘‘राजन ! अब तुम्हीं बताओ कि वह कन्या किसको मिलनी चाहिए ? ज्ञानी को, वीर को अथवा अलौकिक विद्याएं जानने वाले उस व्यक्ति को ? सब कुछ जानते हुए भी यदि तुम इसका उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हारा सिर फटकर कई टुकड़ों में बंट जाएगा। ’’
बेताल की यह कथा सुनकर, अपना मौन तोड़ते हुए विक्रम बोला—‘‘बेताल, वह कन्या उस वीर को ही मिलनी चाहिए, क्योंकि उसी ने उद्यम करके, अपने बाहुबल द्वारा उस राक्षस को युद्ध में मारा और उस कन्या को अर्जित किया था। विधाता ने ज्ञानी और अलौकिक विद्याएं जानने वाले को तो उसका काम करने के लिए माध्यम मात्र बनाया था।
‘‘तुमने ठीक उत्तर दिया राजन। ’’ बेताल तत्काल बोल उठा—‘‘पर तुम अपनी शर्त भूल गए। तुमने मौन भंग किया और शर्त के अनुसार मैं फिर स्वतंत्र हो गया। ’’
यह कहकर बेताल राजा के कंधे से उतरकर वापस उसी शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया।
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