बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवां बेताल
मदनसेना की कथा
अनंतर, विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष के पास जाकर बेताल को वृक्ष से उतारा, अपने कंधे पर डाला और वहां से चले पड़ा।
जाते हुए राजा से, उसकी पीठ के ऊपर बैठे हुए बेताल ने कहा—‘‘राजन ! तुम थक गए हो, इसलिए थकावट दूर करने के लिए मुझसे यह कथा सुनो।’’
किसी समय वीरबाहु नाम का एक श्रेष्ठ राजा था, जो छोटे-बड़े अनेक राज्यों पर राज करता था। उसकी राजधानी अनगपुर नामक नगरी थी जो वैभव व भव्यता में कुबेर की नगरी को भी मात करती थी।
उसी नगरी में अर्थदत्त नाम का एक महाधनी व्यापारी रहता था। व्यापारी की दो संतानें थीं। बड़ा लड़का, जिसका नाम धनदत्त था और छोटी एक लड़की, जिसका नाम मदनसेना था। मदनसेना कन्याओं मे रत्न के समान थी।
एक दिन मदनसेना बगीचे में अपनी सखियों के साथ खेल रही थी। तभी धनदत्त का एक मित्र, जिसका नाम धर्मदत्त था, धनदत्त से मिलने पहुंचा। वहां बगीचे में अपनी सहेलियों के मध्य हंसी-मजाक करती हुई मदनसेना को जब उसने देखा तो बस देखता ही रह गया। धर्मदत्त उसे देखते ही उस पर आसक्त हो गया था। उसका हृदय कामदेव के बाण-समूहों से छिदकर रह गया था।
मदनसेना के शरीर से लावण्य का रस झर रहा था। उसे देखकर हठात् ही धर्मदत्त के मुख से निकल गया—‘‘आह ! अलौकिक रूप की शोभा से जगमगाने वाली इस कन्या को शायद स्वयं कामदेव ने मेरा हृदय बेधने के लिए इस तीखे तीर के रूप में बनाया है। ’’
वह बहुत देर तक एक पेड़ की ओट से मदनसेना के रूप का रसपान करता रहा और जब मदनसेना अपने घर के अंदर चली गई तो उसका मन उसे पाने के लिए व्यथित होने लगा। वह दुखी मन से घर लौटा और बिस्तर पर पड़ गया। उसके कई मित्रों ने उसकी इस विकलता का कारण पूछा किंतु धर्मदत्त कुछ भी न कह सका।
उस रात स्वप्न में भी वह अपनी प्रिया को ही देखता रहा और उसकी मनुहार करता रहा। किसी ने सच ही कहा है—‘उत्सुक हृदय वाला मनुष्य क्या-क्या नहीं करता ?’
सवेरे उठकर वह फिर उसी बगीचे में गया। वहां उसने मदनसेना को अकेली बैठा देखा। वह अपनी सखियों की प्रतीक्षा कर रही थी। उसका आलिंगन करने के इच्छा से वह उसके पास पहुंचा और उसके निकट झुककर प्रेम के कोमल वचनों से उसे रिझाने लगा।
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