भारतकोश
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished151 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 151 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 72

‘कहीं यही तो नहीं है’—ऐसा सोचते हुए उसने जैसे ही उसके मुंह से चादर हटाई, उसने अपनी मनचाही स्त्री को ही देखा।

मुख से चादर हटते ही वह सुंदरी अचकचाकर उठ बैठी और घबराई हुई नजरों से राजा को देखने लगी। फिर उसने राजा से पूछा—‘‘आप कौन हैं और इस अगम्य रसातल में आप कैसे आ पहुंचे ? आपके शरीर पर तो राजचिन्ह अंकित है, फिर आपने यह तपस्वी का वेश क्यों बना रखा है ? हे महाभाग, यदि मुझ पर आपकी कृपा हो तो मुझे यह बतलाएं।’’

तब राजा ने अपना परिचय दिया और आने का उद्देश्य भी बता दिया। फिर उसने उस सुंदरी से अपना परिचय देने को कहा तो सुंदरी बोली—‘‘हे महाभाग ! मैं विद्याधरों के राजा, सौभाग्यशाली मृगांकसेन की कन्या मृगांकवती हूं। मेरे पिता न जाने किस कारण से मुझे इस नगर में अकेली छोड़कर, नगरवासियों सहित जाने कहां चले गए हैं। इसलिए इस सूनी बस्ती में जी न लगने के कारण, मैं समुद्र पर उतरकर, यांत्रिक कल्पवृक्ष पर बैठी भवितव्य के गीत गाया करती हूं।’’

मृगांकवती के ऐसा कहने पर, उस मुनि की बातें स्मरण करते हुए राजा ने उसे अपनी प्यार-भरी बातों से इस तरह से रिझाया कि प्रेमवश होकर उसने उसी समय उस वीर राजा की पत्नी बनना स्वीकार कर लिया किंतु साथ ही एक शर्त भी लगा दी। उसने कहा—‘‘आर्यपुत्र, प्रत्येक मास में शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी और चतुर्दशी को चार दिन के लिए, मैं आपके पास उपलब्ध नहीं रहूंगी। इन दिनों में मैं जहां चाहूं, आप न तो मुझे रोकेंगे और ना ही कोई प्रश्न पूछेंगे। बोलो स्वीकार है ?’’

‘‘हां प्रिये, मुझे स्वीकार है। ’’

राजा के ऐसा कहने पर अलौकिक कन्या ने उसी समय गांधर्व विधि से विवाह कर लिया। राजा उसके यहां रहते हुए दाम्पत्य-जीवन का सुख प्राप्त करने लगा।

जब कई दिन बीत गए तो एक दिन मृगांकवती ने उससे कहा—‘‘आर्यपुत्र, मैंने जिसके बारे में आपसे कहा था, वह कृष्णपक्ष की चतुर्दशी आज ही है। मैं काम से कहीं बाहर जा रही हूं। आप यहीं मेरी प्रतीक्षा कीजिए, किंतु स्वामी, यहां रहते हुए आप उस स्फटिक के भवन में मत जाना क्योंकि वहां की वादी में गिरते ही आप भू-लोक में पहुंच जाएंगे।’’

इस प्रकार राजा को समझा-बुझाकर वह नगर से बाहर चली गई। राजा के मन में कौतूहल हुआ इसलिए हाथ में तलवार लेकर वह भी छिपकर उसके पीछे-पीछे गया।

वहां राजा ने आते हुए एक राक्षस को देखा। वह अंधकार की तरह काला था और उसका मुख गह्वर खुला हुआ था जिससे वह साकार पाताल की भांति जान पड़ता था। उस राक्षस ने घोर गर्जन के साथ झपटकर मृगांकवती को अपने मुंह में डालकर निगल लिया।

बेताल पच्चीसी 🞎 73