बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवां बेताल
ब्राह्मण हरस्वामी की कथा
राजा विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष से पहले ही की भांति बेताल को नीचे उतारा और उसे कंधे पर डालकर अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ा। जाते हुए राजा से बेताल बोला—‘‘‘राजन ! इस बार तुम्हें एक छोटी-सी कथा सुनाता हूं, सुनो। ’’
वाराणसी नाम की एक नगरी है, जो भगवान शिव की निवास-भूमि है। वहां देवस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वहां का राजा उस ब्राह्मण का बहुत सम्मान करता था।
देवस्वामी धन-धान्य से बहुत सम्पन्न था। परिवार में सिर्फ तीन ही प्राणी थे, वह स्वयं, उसका पुत्र हरस्वामी और अत्यंत उत्तम गुणों वाली पत्नी—लावण्यवती। लावण्यवती सचमुच अपूर्व सुन्दरी थी। ऐसा लगता था जैसे तिलोत्तमा आदि स्वर्ग की अप्सराओं का निर्माण करके विधाता को जो कुशलता प्राप्त हुई थी, उसी के द्वारा उसने उस बहुमूल्य रूप-लावण्य वाली स्त्री को बनाया था।
एक बार रात्रि को हरस्वामी जब अपनी पत्नी के साथ अपने भवन की छत पर सोया हुआ था, तभी मदनवेग नाम का एक इच्छाधारी विद्याधर आकाश से विचरण करता हुआ उधर से निकला। उसने पति के पास सोई हुई लावण्यवती को देखा, जिसके वस्त्र थोड़े खिसक गए थे और उसके अंगों की सुंदरता झलक रही थी। उसकी सुंदरता देखकर मदनवेग उस पर मोहित हो गया। उस कामांध ने सोई हुई लावण्यवती को उठा लिया और आकाश में उड़ गया।
क्षण भर बाद ही हरस्वामी जाग उठा और अपनी पत्नी को अपने स्थान से गायब पाकर घबरा उठा। वह सोचने लगा—‘अरे यह क्या हुआ ? वह कहां गई ? क्या वह मुझसे नाराज हो गई है अथवा कहीं छिपकर मेरे मनोभाव जानने के लिए परिहास कर रही है ?’ ऐसी अनेक शंकाओं से विकल होकर वह रात में महल, अटारी और दूसरी छतों पर जहां-तहां उसे खोजने लगा। घर और बगीचे में ढूंढने के पश्चात् भी जब लावण्यवती नहीं मिली, तब शोकाग्नि से संतप्त होकर वह आंखों में आंसू भरकर इस प्रकार विलाप करने लगा—‘‘हे चंद्रबिम्ब बदने, हे ज्योत्सना गौरी, हे प्रिये ! समान गुणवाली होने के द्वेष से ही क्या यह रात तुम्हें सहन नहीं कर सकी। तुमने अपनी कांति से चंद्रमा को जीत लिया था; इसी कारण वह डरता हुआ अपनी शीतल किरणों से मुझे सुख पहुंचाया करता था। लेकिन प्रिये, अब तुम्हारे न रहने पर मौका पाकर जलते अंगारों के समान तथा विष बुझे बाणों के सदृश अपनी उन्हीं किरणों से वह मुझे घायल कर रहा है।”
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