बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट द्वारा
पृष्ठ 99, कुल 151 में से
संदर्भ में पढ़ेंही हो जाएगा। अतः उसने विनयपूर्वक गरुड़ के सामने एक योजना रखी—'हे पक्षीराज, इस दक्षिण समुद्र के किनारे तुम्हारे भोजन के लिए मैं प्रतिदिन एक सर्प भेज दिया करूंगा किंतु तुम किसी प्रकार, किसी भी समय पाताल में नहीं आओगे; क्योंकि एक साथ ही सब सर्पों के नष्ट हो जाने से तुम्हें भी कुछ लाभ नहीं होगा।'
गरुड़ ने भी इसमें अपना लाभ देखा और वासुकि की बात स्वीकार कर ली। पक्षीराज गरुड़ इस तट पर वासुकि द्वारा भेजे हुए एक सर्प को प्रतिदिन खाया करता है। यह उसी के द्वारा खाये गए सर्पों की हड्डियां हैं, जो समय पाकर बढ़ते-बढ़ते अब पर्वत शिखर के समान हो गई हैं।
दया और धैर्य के सागर जीमूतवाहन ने मित्रावसु के मुख से जब यह वृत्तांत सुना तो उसके मन को भारी कष्ट पहुंचा। उसने कहा—"शोक करने के योग्य तो सर्पों का राजा वासुकि है जो ऐसा कायर है कि प्रतिदिन अपनी प्रजा को शत्रु को भेंट कर देता है। हजार मुखवाला यह वासुकि अपने एक मुख से भी यह क्यों नहीं कह सका कि 'गरुड़, पहले तुम मुझे ही खा लो।' प्रतिदिन नगरपलियों का विलाप सुनकर भी उस निर्दयी वासुकि ने अपने कुल का नाश करने वाले गरुड़ से प्रार्थना क्यों की ? अरे, मोह भी कैसा गाढ़ा होता है ! यद्यपि गरुड़ महर्षि कश्यप का पुत्र है, वीर है और भगवान विष्णु का वाहन होने के कारण पवित्र है, फिर भी ऐसा पाप करता है।'
ऐसा कहकर परम पराक्रमी जीमूतवाहन ने मन-ही-मन निश्चय किया कि 'इस नाशवान शरीर से मैं अमरता प्राप्त करूंगा। मैं आज ही अपना शरीर देकर गरुड़ के पंजे से कम-से-कम एक ऐसे सर्प की रक्षा करूंगा जो हितैषियों से रहित तथा डरा हुआ है।'
जीमूतवाहन ऐसा सोच ही रहा था तभी मित्रावसु के पिता के पास से एक प्रतिहारी उन्हें बुलाने के लिए वहां पहुंच गया। जीमूतवाहन ने यह कहकर उसे घर भेज दिया कि 'तुम चलो, मैं कुछ देर बाद आऊंगा।'
मित्रावसु के जाने के बाद जीमूतवाहन वैसे ही इधर-उधर विचरण करने लगा। तभी उसके कानों में किसी के रुदन का स्वर सुनाई पड़ा। वह पास पहुंचा और छिपकर एक शिलाखंड के नीचे खड़ा हो गया। वहां उसने एक वृद्धा नागस्त्री को विलाप करते देखा। उसके समीप ही एक सुंदर-सा काले रंग वाला नागयुवक खड़ा था, जो उस स्त्री से अनुनयपूर्वक उसे घर लौट जाने को कह रहा था।
'यह कौन है ?' इसे जानने को उत्सुक जीमूतवाहन ने छिपकर उनकी बातें सुनीं। वृद्धा स्त्री उस युवक से रोते हुए कह रही थी—' 'हा शंखचूड़, हा सौ-सौ दुखों से पाए हुए मेरे गुणी पुत्र ! हा मेरे कुल के एकमात्र सूत्र, अब मैं फिर तुम्हें कहां देख सकूंगी। हा मेरे कुलदीपक ! तुम्हारे बिना तुम्हारे वृद्ध पिता कैसे अपना बुढ़ापा काट सकेंगे ? तुम्हारे जो अंग सूर्यकिरणों के स्पर्श से भी कुम्हला जाते थे, वे गरुड़ के द्वारा खाये जाने की पीड़ा कैसे सहन कर पाएंगे ? नागलोक तो बहुत बड़ा है, फिर विधाता
100 ▢ बेताल पच्चीसी