भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1000, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें९६८ भैषज्यरत्नावली । [ शोथ-
प्रदिष्टं तु तदेव चापि । यथामलं पथ्यमिदं प्रदिष्टं शोथामयं सत्वरमुच्छिनत्ति ॥ ५४ ॥
दोषोंका शमन करनेवाली औषधें, लंघन, रक्तमोक्षण, स्वेदप्रदान, शरीरपर लेप और सिञ्चन क्रिया करना, पुराने शालिके चावल, जौ, कुलथी और मूँग आदि अन्नोंका भोजन, गोह, सेई, मोर, तीतर, मुर्गा, लवा एवं जंगली जीवोंका मांस और विष्किरजीवोंका मांस, कछुएका मांस, शृङ्गीमत्स्य, पुराना घी, मट्ठा, मदिरा, शहद, आसव, सेमकी फली, करेला, लाल सहिँजना, आम, ककोडा, मानकन्दकी घुइयाँ, हुलहुलके पत्ते, गाजर, परवल, वेतका अग्रभाग, बैंगन-मूली, पुनर्नवा, चीता, फरहद, अरणी, नीमके पत्ते, तालमखानेके पत्ते, अण्डीका तेल, कुटकी, हल्दी, हरड, खारवाले द्रव्य, भिलावा, मुगल, अगर तथा कडवे चरपरे और पाचक द्रव्य, गौ, बकरी और भैंसका मूत्र, कस्तूरी, शिलाजीत और पाण्डुरोगाधिकारमें कहा हुआ अग्निकर्म ये सम्पूर्ण वस्तुयें शोथरोगीको दोषानुसार विचारपूर्वक सेवन करानेसे शोथरोग शीघ्र छिन्न भिन्न होजाता है ॥ ४९-१५४ ॥
शोथमें अपथ्य ।
नित्यं दुष्टं पवनसलिलं वेगरोधाद्विरुद्धं सर्वं पानं विषममशनं मृत्तिकाभक्षणं च । ग्राम्यानूपं पिशितलवणं शुष्कशाकं नवान्नं गौडं पिष्टं दधि सकृशरं निर्जलं मद्यमम्लम्- धाना वल्लूरं समशनमथो गुर्वसात्म्यं विदाह्य- स्वप्नं रात्रौ श्वयथुगदवान्वर्जयेन्मैथुनं च ॥ १५५ ॥
प्रतिदिन दूषित वायुसेवन, दूषित जल पान करना, मल मूत्रादिके वेगको रोकना, सर्व प्रकारके विरुद्ध पानीय द्रव्य, विषम भोजन, मृत्तिका भक्षण, गाँवके और अनूप-देशीय जीवोंका मांस, नमक, सूखे शाक, नया नाज, गुडकी बनी वस्तुयें, पिष्ठीवाले अन्न, खिचडीके साथ दही, बिना जलकी मदिरा, खट्टे पदार्थ, खीलें, शुष्क मांस, भारी, अहितकर और दाहकारी पदार्थोंका भोजन, रात्रिमें जागना, स्त्रीप्रसंग करना शोथयुक्त रोगी इन सबको त्यागदेवे ॥ १५५ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां शोथचिकित्सा ।